इस वर्ष विज्ञान दिवस की थीम विज्ञान और महिलाओं पर केंद्रित है। सच तो यह है कि दुनिया की ये आधी आबादी आज भी नए विज्ञान से वंचित है। हमने इस हिस्से के लिए न कभी गंभीरता से सोचा और न ही इन्हें उचित भागीदारी दी। और क्षेत्रों की तरह विज्ञान में भी इनका प्रतिनिधित्व पुरुषों की तुलना में नगण्य है। इनकी भूमिका वैसे भी महत्वपूर्ण हो सकती थी, क्योंकि यह एक ऐसा विषय है, जिसमें हम विज्ञान व उसके फल को समानता की तरफ ले जा सकते हैं।
महिलाओं में धैर्य, सहनशीलता व संवेदनशीलता जैसे गुण हैं, जो हमेशा एक ऐसे विज्ञान के प्रति झुकाव रखने के पक्ष में रही हैं, जिससे निरंतरता जुड़ी है। और इसका सीधा कारण भी है कि महिलाओं को प्रकृति ने जिस तरह के चरित्र और गुणों से प्रदत्त किया है, वे एक ऐसे समाज और विज्ञान की कल्पना कर सकती हैं, जिससे जीवन बेहतर हो और विज्ञान के लाभ बड़े स्तर पर पहुंचाए जा सकें। आज विज्ञान शायद पुरुष प्रधान ज्यादा है और यही कारण है कि पिछले 200 वर्षों में छोटे स्तर के प्रयोग हों या बड़े चमत्कार, जो देश दुनिया में हुए हैं, उन सबमें पुरुष प्रधानता ही झलकती है। मसलन, अगर किसी महिला को विज्ञान की प्राथमिकता तय करने को कहा जाए, तो वह परमाणु बम या युद्धपोत या बड़े हथियारों के पक्ष में नहीं जाएगी। यह पुरुषवादी प्रवृत्ति ही है, जो अपनी प्रधानता बनाने के लिए हथियारों की होड़ का हिस्सा बनता है और जिसका आधार विज्ञान व तकनीक बनी।
हमने विज्ञान के उत्पादों को अपनी बड़ी उपलब्धियों के साथ जोड़ने की कोशिश की और उसमें एक बड़ा महत्वपूर्ण हिस्सा यह भी रहा कि हमने एक ऐसे विज्ञान की बात की, जो बाजार में बिक सकता हो। और यही कारण है कि पिछले 200-300 वर्षों में अगर पूरी दुनिया को टटोल लें, तो जिस तरह से उद्योगों व उत्पादों की बाढ़ आई, उससे साफ दिखता है कि विज्ञान का झुकाव किस तरफ ज्यादा रहा। वहीं दूसरी तरफ दुनिया का बड़ा हिस्सा जो कि ग्रामीण है, वह आज भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित है और इस बड़े हिस्से में खेती-बाड़ी से लेकर रोजमर्रा के कार्यों में विज्ञान का प्रत्यक्ष जुड़ाव नहीं दिखाई देता। साफ है कि विज्ञान की एक बड़ी भूमिका, जो एक आम जन के लिए होनी चाहिए थी, उस पर वह आज भी खरा नहीं उतरता।
तमाम खोज व आविष्कार करते हुए हमने कई लैंडमार्क खड़े किए हैं, लेकिन आज भी दुनिया के कई हिस्से में लोगों को भरपेट भोजन नहीं मिलता, उनके पास रहने को घर नहीं हैं और वे इस दुनिया के वंचित बदसूरत चेहरे मान लिए जाते हैं, जिनके पास हर तरह का अभाव है। अगर विज्ञान की दिशा तय करने वाली महिलाएं होतीं, तो निश्चित रूप से वे मुद्दे, जो आज पिछड़ गए या गांव जिनकी आज विज्ञान में बहुत बड़ी गिनती नहीं दिखाई देती, वहां हालात ऐसे नहीं होते।
करोड़ों लोगों के लिए अगर विज्ञान के रास्ते तैयार करने हो, तो शायद सबसे बेहतर रोडमैप महिलाएंं ही बना सकेंगी, क्योंकि वे संवेदनशील होने के साथ-साथ निरंतरता के पक्ष में रहती हैं। देश के गांव आज महिलाओं से ज्यादा चलते हैं बनिस्बत पुरुषों के। गांव की महिलाओं और महिला विज्ञानियों को जोड़कर अगर हम नीति बनाएंगे, तो शायद जिस हिस्से तक हम विज्ञान के लाभ नहीं पहुंचा पाए, उस बड़ी रिक्तता को हम भर पाएंगे। महिला और विज्ञान की इस थीम को अगर बेहतर तरीके से आगे बढ़ाना है, तो महिला वैज्ञानिकों के साथ घर-गांव की महिलाएं,ं जो स्वतंत्रता के 72 वर्षों के बाद भी सुविधाओं से वंचित हैं, उन्हें साथ जोड़कर देखना होगा, तभी हम विज्ञान को निष्पक्ष साबित कर पाएंगे।