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'भेड़िया' तो सचमुच आ गया

Wed, 24 Dec 2014 09:21 PM IST
विजय क्रांति
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अच्छा नहीं लगता, जब कोई नाटक बीच में ही रुक जाए। अच्छा नहीं लगता, जब हाथों-हाथ बिकने वाला माल सेल्समैन के काउंटर से एकदम गायब हो जाए। बल्कि तब तो सचमुच ही अच्छा नहीं लगता, जब ‘भेड़िया-आया’ के नाम पर चलते हुए रंग-बिरंगे तमाशे में भेड़िया सचमुच ही आ जाए। कश्मीर घाटी में इस बार यही हो गया। जम्मू-कश्मीर की जनता ने वोटिंग मशीन का बटन दबाकर ‘भेड़िए’ के खौफ पर 67 साल से हाउस-फुल चलते आ रहे थियेटर का परदा अचानक गिरा दिया। दिल्ली का ‘भेड़िया’ सचमुच श्रीनगर आ गया। लंदन और इस्लामाबाद से चलाए जा रहे कश्मीरी शेयर बाजार का ग्राफ रातोंरात डल झील के फ्रीजिंग पॉइंट से भी नीचे गिर गया।
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इसमें शक नहीं कि इस नाटक के चलते रहने से इसके सूत्रधारों और उसके खिलाड़ियों को बहुत मजा आ रहा था। मगर इनमें से किसी को भी यह देखने की फुर्सत नहीं थी कि दर्शकों को भी मजा आ रहा है या नहीं? वर्षों से एक ही जगह पर बैठकर फिरन के भीतर कांगड़ी तापते हुए एक ही तमाशा देखते-देखते दर्शक ऊब चुके थे। हालांकि जनता को रिझाए रखने के सारे टोटके मौजूद थे। स्कूल-कॉलेज के लड़कों के हाथों में सौ-सौ रुपये के नोटों में लपेटकर पत्थर थमा दो। उसके बाद वे जानें और पुलिस। जहां तक मंडली के अपने बच्चों की बात थी, तो उनके लिए लंदन, दिल्ली और बंगलूरू के कॉलेज-होस्टल तो थे ही?

इसके बाद भी अगर कोई हिसाब मांगे, तो शोर मचाकर उसे समझा दो कि हमारे पीछे छिपे रहो, वरना दिल्ली का 'भेड़िया' तुम्हें खा जाएगा। मगर इस बार तो जनता ने निर्देशन अपने हाथों में ले लिया। उसने दिल्ली के ‘भेड़िए’ से सीधी बात करने का फैसला कर लिया। उधर नाटक मंडली के लोग 'भेड़िया' को कोसने में लगे हुए हैं कि अजीब जीव है, नाटक की संस्कृति भी नहीं समझता। अच्छा भला चलता हुआ नाटक रोक दिया।
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