जैसे बिना समर्थन के सरकारें नहीं चलती, उसी तरह बिना दाल के घर नहीं चल सकता। दाल गृहस्थी की ऐसी सब्जी है, जिसमें पानी का एक गिलास और डालकर घर में आए अतिथि को सुलटाया जा सकता है। लेकिन अब तो दाल सौ रुपये किलो हो गई है। इस भाव में तो लगता है कि दाल का पानी ही पीना पड़ेगा।
मेरे शरीर में प्रोटीन की कमी है और डॉक्टर ने मुझे दाल का प्रयोग रोजाना एक टाइम आवश्यक बताया है। परसों की बात है। पत्नी ने अपनी तबियत नासाज बताई, तो मैंने कहा, खाना बाहर से मंगवा लेते है। मैंने टिफिन सेंटर वाले को फोन करके कहा कि भैया, एक प्लेट दाल और आठ चपातियां भिजवा देना। टिफिन सेंटर वाला बोला, फ्राई दाल एक प्लेट सौ रुपये की है।
प्याज के भाव से मैं कभी विचलित नहीं हुआ, क्योंकि हम पति-पत्नी दोनों प्याज नहीं खाते। लेकिन दाल तो पेट्रोल की तरह भभक उठी है। आदमी की दाल-रोटी मुश्किल हो गई है। सुबह पत्नी का भाई आ गया, तो पत्नी ने हलवा घोट दिया और चपाती-सब्जी बना दी। साले साहब बोले, जीजू, जीरे वाली दाल बनवा लो, तो खाने का मजा आ जाएगा। दस-पंद्रह दिनों से दाल नहीं खा पाया हूं। मजबूरी में बघार देकर दाल बनवानी पड़ी।
कहते हैं, गरीब दाल-रोटी खाता है। लेकिन दाल-रोटी खाने वाला गरीब कहां से हुआ? दाल में तेजी के पीछे सरकार बढ़ते डॉलर के भाव को दाल के बाजार भाव से जोड़ देती है। विपक्ष कहता है कि देश की जरूरत पूरी नहीं हो रही, तो दाल निर्यात करने की क्या जरूरत है? सरकार का तर्क है कि निर्यात रोकने पर विदेशी मुद्रा भंडार कम हो जाएगा और मंहगाई आसमान छूने लगेगी। पेचिश होने पर दवा करते हैं, तो पेट खराब हो जाता है, और पेट ठीक करने की दवा लेते हैं, तो दोबारा पेचिश हो जाता है। बेचारी सरकार कौन-सी बीमारी का इलाज करे?
पर मैं बिना दाल के क्या करूं? प्रोटीन की कमी से तपेदिक तक हो जाता है। पर अभी बाजार भाव पर दाल खाऊं, तो तपेदिक गृहस्थी की चिंताओं से हो जाएगा।