लो जी फिर आ गया प्यार का मौसम। उनके दिल में दबी स्थायी प्रेम की चाहत फिर उभर आई। पर हाय रे नसीब। हमेशा की तरह वही तन्हाई। सदा हरी-भरी बनी रहने वाली प्रेम की बेल कहीं नजर न आई।
जब भी प्यार का मौसम आता है, बरबस ही उनके होठों पर उनका यह स्वरचित गीत थिरक जाता है- कैसे प्यार करें, किसको प्यार करें। रोज बदलते लोग यहां, किस पर ऐतबार करें। गीत के साथ ही दिल का दर्द बढ़ जाता है। आंखें छलछला पड़ती हैं, गला भर आता है। बिना कहे दिल का हाल बयां हो जाता है। क्या करें! उनके पुराने खयालात हैं, बस इसीलिए बुरे हालात हैं।
उन्हें स्थायी प्रेम पर विश्वास है, जो इस संसार से नदारद है। इसका भी उन्हें आभास है। वह दूरदर्शी हैं, दूर की सोचते है। वह क्षणिक प्रेम को मानते नहीं हैं। वह प्रेम को भारतीय जीवन बीमा की तर्ज पर चाहते हैं। जिंदगी के साथ भी, जिंदगी के बाद भी। वह नया नौ दिन, पुराना सब दिन की वकालत करते हैं। भई ऐसा प्रेम तो लोक-कथाओं में या फिर देवी-देवताओं में मिलता है। मित्रजन उन्हें समझाने में लगे हैं। आंखों से अंधकार की पट्टी उतारने में लगे हैं। आज की नई सच्ची तस्वीर दिखाने में लगे हैं- कि संसार में कुछ भी स्थिर नहीं है, जो आता है, वह जाता भी है। टिकता वही है, जिसका टाइम फिक्स है, प्रेम का समय फिक्स नहीं है। वह कभी भी आ जाता है, कभी भी चला जाता है। अब उसका कोई वजूद नहीं है। आज इसके, तो कल उसके दिल में बेधड़क धुस जाता है। जहां लाभायमान होता है, वहीं डेरा जमाता है। टिकना तो किसी भी चीज का बहुत ही मुश्किल है। टिकती तो हमारे यहां सरकारें भी नहीं है। वैसे भी चेंज और लेटेस्ट का जमाना है। अरे भई फिर क्यों गोल्डन चांस गंवाना? जब सब चलायमान है, फिर आप क्यों टिकायमान हैं?
इसलिए हे मित्र, समय के साथ कदम बढ़ाओ, लंबे सुख की चाह में क्षण भी न गंवाओ। पर वह कहां सुनने वाले, अपनी ही धुन में रमने वाले। कभी माथा, तो कभी छाती पीट रहे हैं और पुराना गीत गाए जा रहे हैं- कैसे प्यार करें, किसको प्यार...।