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युवा उत्तराखंड को लगे पंख

तरुण विजय, पूर्व भाजपा सांसद (राज्यसभा) Published by: Raman Singh Updated Thu, 07 Nov 2019 06:58 PM IST
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तरुण विजय, पूर्व भाजपा सांसद (राज्यसभा) - फोटो : a

कल उत्तराखंड राज्य अपने गठन के उन्नीस साल पूरे कर बीसवें साल में प्रवेश कर जाएगा। देश में यह शायद पहला प्रदेश है, जो महिलाओं की अगुवाई, संघर्ष तथा हिम्मत से बना। भारत की भाषा और परिभाषा में आदिकाल से उत्तराखंड क्षेत्र का योगदान रहा है। कुमाऊं क्षेत्र चोटी के राजनेताओं और साहित्यकारों के कारण विश्व विश्रुत हुआ। आजादी के बाद यदि किसी प्रदेश के आर्थिक विकास के साथ नागरिक गौरव की प्रगति गाथा लिखी जाए, तो आज वह प्रदेश उत्तराखंड होगा। फौजियों और पंडितों के लिए प्रसिद्ध इस प्रदेश के लोग राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संगठनों में नए आयाम बना रहे हैं। इसरो से लेकर भाभा अणु अनुसंधान केंद्र और ललित कला से लेकर नाट्य रंगमंच के क्षेत्र में अथवा अंग्रेजी, हिंदी पत्रकारिता जगत में बिना किसी उत्तराखंडी के शायद ही कोई संस्थान मिले। मेहनती, ईमानदार तथा कुशाग्र बुद्धि के उत्तराखंडियों ने चीन से लेकर जापान और अमेरिका से लेकर पूर्वी एशिया में चिकित्सा, इंजीनियरिंग,  आतिथ्य व खान-पान के क्षेत्र में अपनी साख बनाई है।



उत्तराखंड बनने के बाद लगा था कि प्रदेश का जमीनी विकास अधिक तीव्र गति से होगा तथा राजनीति प्रदेश के विकास को प्राथमिकता देगी। पर उत्तराखंड राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं,  चरम जातिगत विद्वेष और भविष्य की विराट दृष्टि की अनुपस्थिति वाले राजकर्मियों (जिन्हें नेता कहना अनुचित होगा) की संकीर्णता का ऐसा शिकार हुआ कि स्थापना से लेकर 2016 तक केवल एक मुख्यमंत्री ऐसे हुए, जो पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा कर सके। 16 वर्ष में यहां 12 मुख्यमंत्री बने।


इसके बावजूद यह यहां के लोगों का कृतित्व है कि प्रदेश ने 2011-12 से अब तक सात प्रतिशत की विकास दर कायम की, और 2017-18 में यहां प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से ज्यादा रही। उत्तराखंड की जनसंख्या लगभग एक करोड़ है, जबकि प्रदेश में पर्यटन और तीर्थाटन के लिए आने वाले यात्रियों की संख्या करीब तीन लाख है। उत्तराखंड देश के पहले नंबर का पर्यटन प्रदेश बन सकता है। पर यहां की अर्थव्यवस्था अब बड़े पैमाने पर औद्योगिकीकरण, रेल तथा सड़क मार्गों से पहाड़ के उत्पादन को देश-विदेश के बाजारों में ले जाने की व्यवस्था, तथा सरकार के पहाड़ तक पहुंचने की जद्दोजहद मांगती है। लगभग समूचा सीमावर्ती क्षेत्र पलायन का शिकार हो चुका है और खाली बस्तियां, ताला लगे मकान गांवों के सन्नाटे को भयावह बना रहे हैं।


गांवों में वापसी की पहल मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने की है और पहली बार सरकारी विभाग तथा स्थापना दिवस के उत्सव देहरादून केंद्रित नहीं, बल्कि अल्मोड़ा और टिहरी में भी आयोजित किए जा रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी के उत्तराखंड में विशेष दिलचस्पी दिखाए जाने के बाद परिस्थिति बदलने लगी है और 2016-17 में प्रति एक लाख जनसंख्या के अनुपात में 322.93 किलोमीटर सड़क निर्माण का कीर्तिमान स्थापित किया गया, जिसे 2030 तक 461.29 किलोमीटर तक ले जाने का लक्ष्य है। यह उत्तराखंड के लिए स्वर्णिम समय कहा जा सकता है, जब पहाड़ के गौरव और आर्थिक विकास की वापसी का युग लाना संभव दिखने लगा है। उत्तराखंड आज समूचे हिमालयी क्षेत्र का नेतृत्व करने की स्थिति में आ गया है। नौ नवंबर, 2000 को स्थापित उत्तराखंड देर से ही सही, पर देवभूमि और वीरभूमि के साथ विकास भूमि बनने का वादा कर रहा है।

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