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क्या केरल में भाजपा खाता खोलेगी

Fri, 10 Jan 2014 11:55 PM IST
एम सी वशिष्ठ
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माकपा और कांग्रेस के अलावा भाजपा भी केरल में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक पार्टी के तौर पर उभर रही है। पिछले कुछ दशकों से केरल के सभी चुनावों में भाजपा में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। राज्य की कुछ ग्राम पंचायतों में उसका बहुमत है, तो कुछ नगरपालिकाओं में वह मुख्य विपक्ष की भूमिका में है। स्कूल एवं कॉलेजों में जहां उसका छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद मजबूत स्थिति में है, वहीं उसका श्रमिक संगठन बीएमएस भी सक्रिय है। जन्मभूमि नाम का उसका अपना अखबार भी है। उसे वर्षों से केजी मरार, के रमण पिल्लई, ओ राजागोपाल, सीके पद्मनाभन, एडवोकेट पीएस श्रीधरन पिल्लई, पीपी मुकुंदन, पीके कृष्णा दास, एमटी रमेश, के सुरेंद्रन जैसे प्रभावी नेताओं का समर्थन हासिल है। इन सबके बावजूद भाजपा अब तक केरल विधानसभा में अपना खाता खोलने या संसद में अपना प्रतिनिधि भेजने में विफल रही है।
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एक राजनीतिक दल के रूप में भाजपा ने 1987 के विधानसभा चुनाव से अपनी मौजूदगी दर्शाई। विधानसभा में तो वह कई बार जीतते-जीतते रह गई, पर लोकसभा चुनाव में केवल एक बार 2004 में वह जीत के करीब पहुंची थी। तब दिग्गज नेता ओ राजागोपाल त्रिवेंद्रम लोकसभा सीट पर दो लाख अट्ठाइस हजार बावन मत प्राप्त कर तीसरे स्थान पर रहे थे। कांग्रेस उम्मीदवार से वह मात्र तीन हजार मतों से पीछे थे, जबकि भाकपा के विजयी प्रत्याशी पीके वासुदेवन नायर ने दो लाख छियासी हजार सतावन मत हासिल किया था, जो राजागोपाल से 28 हजार ज्यादा था। उसी चुनाव में राजग प्रत्याशी (इंडियन फेडरल डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार) पीसी थॉमस ने मात्र 529 वोटों से मुवत्तुपुझा से चुनाव जीता था। वह चुनाव राजग के इंडिया शाइनिंग की पृष्ठभूमि में लड़ा गया था। तब राज्य के लोगों की धारणा थी कि राजग सत्ता में लौटेगा और केरल को ओ राजागोपाल एवं पीसी थॉमस के रूप में दो केंद्रीय मंत्री मिलेंगे। उस चुनाव में राज्य में भाजपा नीत राजग के सर्वोत्तम प्रदर्शन की यही सबसे बड़ी वजह थी।

त्रिकोणीय मुकाबले (एलडीएफ, यूडीएफ और भाजपा) की स्थिति में केरल में लोकसभा का चुनाव जीतने के लिए किसी प्रत्याशी को कम से कम तीन लाख वोट चाहिए। यानी मौजूदा स्थिति में भाजपा प्रत्याशी को कम से कम डेढ़ लाख नए वोट प्राप्त करने होंगे। अब सवाल उठता है कि भाजपा ये वोट कहां से हासिल करेगी और उसके नए मतदाता कौन होंगे। जाहिर है, उसे नए मतदाता बनाने होंगे।
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अब तक चुनावों में भाजपा के बदतर प्रदर्शन की मुख्य वजह यह है कि केरल की राजनीति शुरुआत से ही एलडीएफ और यूडीएफ के आसपास सिमटी रही है। इसके अलावा राज्य के बहुसंख्यक एझवा और थिया समुदायों की निष्ठा अब भी माकपा के साथ जुड़ी दिखती है। भाजपा को इन समुदायों के मतदाताओं का दिल जीतने के लिए नई रणनीति अपनानी होगी। हालांकि देश के दूसरे हिस्सों की तरह यहां भी नरेंद्र मोदी का कमोबेश प्रभाव दिखता है। यहां का मीडिया उन्हें बहुत महत्व दे रहा है। सोशल मीडिया के जरिये युवाओं में मोदी की पैठ बन गई है। भाजपा कार्यकर्ताओं ने राज्य के विभिन्न इलाकों में मोदी के पोस्टर एवं बैनर लगा रखे हैं। केरल में आप कहीं भी चले जाइए, हरेक 500 मीटर पर आपको नरेंद्र मोदी के पोस्टर मिलेंगे। जाहिर है, पूरे देश की तरह केरल में भी भाजपा का भाग्य मोदी पर ही निर्भर है।

केरल में लोकसभा की 20 सीटें हैं, जिनमें कम से कम तीन सीटों, उत्तर में कसारगोडे, दक्षिण पूर्व में पलक्कड और धुर दक्षिण के त्रिवेंद्रम, पर भाजपा की मौजूदगी दमदार है। मोदी प्रभाव के अलावा आगामी चुनाव में पार्टी क्या रणनीति अपनाती है, यह देखना बाकी है। लेकिन इसमें शक नहीं कि इस बार राज्य में भाजपा के सबसे महत्वपूर्ण प्रत्याशी के सुरेंद्रन होंगे, जो कसारगोडे या त्रिवेंदम से चुनाव लड़ सकते हैं। यदि देश में मोदी का जादू चलता है, तो वह केरल में भी भाजपा के मजबूत पकड़ वाले निर्वाचन क्षेत्रों में उसके भाग्य को प्रभावित कर सकता है। फिलहाल हम इंतजार ही कर सकते हैं कि 'देवताओं के अपने देश' में इस बार कमल खिलेगा या नहीं।
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