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बाजार में इतनी हलचल क्यों है

मधुरेन्द्र सिन्हा Updated Tue, 16 Oct 2018 07:21 PM IST
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शेयर बाजार

अभी कुछ दिनों पहले शेयर बाजार के खिलाड़ी सेंसेक्स के 40,000 तक जाने की बात कर रहे थे। अति आशावादी तो इस साल के अंत में इसके 50,000 छू जाने की भी उत्साहवर्धक संभावनाएं जता रहे थे। कई शेयरों ने ऊंचाई के नए रिकॉर्ड बना दिए थे और कई बनाने वाले थे। लेकिन अंदर ही अंदर जो हो रहा था, वह किसी को दिखाई नहीं पड़ रहा था। पहले तो मिड कैप और स्मॉल कैप के शेयरों के भाव में भारी कमी आई और उनके धारकों को घाटा होने लगा। उसके थोड़े समय ही बाद सूनामी आई और शेयर बाजार धराशायी हो गया। यह घटना एक बार नहीं कई बार दोहराई गई और शेयर बाजार का सूचकांक फिर से 2017 के स्तर पर जा पहुंचा। जिन लोगों ने भारी निवेश किया था, उन्हें बहुत चोट पहुंची और उनके लाखों करोड़ों रुपये डूब गए। शेयर बाजार के खिलाड़ियों को 2008 की याद आने लगी, जब बाजार में कत्लेआम मचा था।



इस बार बाजार के धराशायी होने के कई कारण रहे। सबसे पहली और मूलभूत बात तो यह थी कि ज्यादातर शेयर अपने मूल्य से अधिक भाव पर चल रहे थे। उनके प्राइस अर्निंग रेशियो (मूल्य आय अनुपात) और उनके भाव में भारी असंतुलन था। यानी वे इन ऊंचाइयों तक पहुंचने के काबिल थे ही नहीं। उन्हें सटोरियों ने इन बुलंदियों तक पहुंचाया था। यह बात मिड कैप और स्मॉल कैप शेयरों पर ज्यादा लागू हुई। दरअसल ज्यादातर खुदरा निवेशक इनमें ही खरीदारी करते हैं और इनके शेयर लगातार बढ़ते ही चले गए। इससे ऐसा आभास हुआ कि इनमें वास्तविक रूप से तेजी है। लेकिन बाद में इनमें सुनियोजित ढंग से गिरावट होती चली गई और ये इतना गिर गए कि इनके निवेशकों के होश उड़ गए। आंकड़े बताते हैं कि इन शेयरों में 32 प्रतिशत तक की कमी आई और निवेशकों को खासा चूना लगा। इन शेयरों के मार खाने का दूसरा बड़ा कारण था आईएल ऐंड एफसी कांड। इस कांड ने तो अमेरिका के लेहमन ब्रदर्स की याद दिला दी, जिसके दिवालिया होने के बाद न केवल अमेरिका, बल्कि सारी दुनिया के शेयर बाजारों में भूचाल आ गया। 2009 की महामंदी उसका ही तो नतीजा थी।


आईएल ऐंड एफसी यानी इन्फ्रॉस्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनेंस कॉरपोरेशन वह वित्तीय संस्था है, जो इस क्षेत्र में काम कर रही कंपनियों को फाइनेंस करती है। इसने 91 हजार करोड़ रुपये बाजार में कर्ज दे रखा है। यह हर तिमाही अपनी किस्त चुकाती है। सरकारी धन से शुरू की गई यह कंपनी लगातार कर्ज देती रही और इसने यह भी नहीं देखा कि उसकी माली हालत खराब होती जा रही है। नतीजतन जून महीने में एक बड़ा धमाका हुआ। आईएल ऐंड एफसी अपनी तिमाही किस्त चुकाने में लाचार हो गई। बैंकों तथा अन्य कर्जदारों से लिए गए धन का ब्याज 450 करोड़ रुपये से भी ज्यादा का था। इसकी 150 सहयोगी कंपनियां हैं, जिन्होंने कई तरह के कर्ज बांट रखे हैं। सितंबर के पहले हफ्ते में सिडबी को 1,000 करोड़ रुपये की किस्त चुकाने में वह नाकाम रही। उसकी एक सहयोगी कंपनी 500 करोड़ की किस्त नहीं दे पाई। इससे बाजार में कोहराम मच गया और कई कंपनियों के शेयर चारों खाने चित्त हो गए। इससे एक संकेत गया कि भारतीय वित्त बाजार में काफी गड़बड़ियां हैं। इस कंपनी के मुश्किल में पड़ जाने से बैंकों के शेयरों में भारी गिरवट आई और कई तो अपने जीवनकाल के न्यूनतम स्तर पर जा पहुंचे। अलबत्ता सरकार ने समझदारी से काम लेते हुए भंवर में फंसी इस कंपनी का प्रबंधन अपने हाथ में ले लिया, जिससे लेहमन कांड की पुनरावृत्ति होने से रह गई।


अक्तूबर के दूसरे हफ्ते में दूसरी सूनामी आई और महज एक दिन में शेयर सूचकांक 1,000 अंकों तक जा गिरा। यह नतीजा था अमेरिकी अर्थव्यवस्था में आए भूचाल का। वहां डाउ जोंस सूचकांक 800 अंकों से भी ज्यादा एक दिन में गिर गया और उसका असर यहां पड़ा। बीएसई सूचकांक 1,000 अंक तो गिरा ही, रुपया तो डॉलर के मुकाबले गिरकर 74.45 पर पहुंच गया। निवेशकों के चार लाख करोड़ रुपये हवा में उड़ गए।


दरअसल शेयर बाजार एक मृगतृष्णा है और जब निवेशक को लगता है कि वह उसके करीब है, तो यह दूर हो जाती है। इसलिए बेहतर होगा कि शेयरों का पीछा न किया जाए। शेयर बाजार के इस मूल सिद्धांत को समझना थोड़ा कठिन है। चढ़ते हुए शेयरों को देखकर उनका पीछा नहीं करना चाहिए। शेयर बाजार में घाटा खाने का बड़ा कारण यही है। इस बार भी यही हुआ। चढ़ते हुए बाजार में निवेशकों ने पैसा लगाया। उधर विदेशी संस्थागत निवेशक मुनाफा काटकर निकल गए। दूसरी ओर सटोरिये भी सक्रिय रहे। यह बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि भारतीय अर्थव्यवस्था का वैश्वीकरण हो चुका है और बाहर होने वाले उठापटक से यह अछूती नहीं है। बाजार के गिरने के कारण हैं, वे ही इसके उठने के कारण बनेंगे। आईएल ऐंड एफसी को सरकार की पहल से जीवन बीमा निगम ने सहारा दिया है। इसके अलावा इसके प्रबंधन में बदलाव भी किया गया है। वित्त मंत्रालय का मानना है कि सरकार के उठाए गए कदम काफी हैं और इसका असर जल्द ही देखने को मिलेगा। उसने बजट के चालू घाटे को नियंत्रित करने का बड़ा कदम उठाया है। सरकार यह भी उम्मीद कर रही है कि कच्चे तेल के दाम 80 डॉलर के आसपास ही रहेंगे। इससे भी अर्थव्यवस्था को सहारा मिलेगा। सबसे अच्छी बात है कि आने वाले समय में मुद्रास्फीति नियंत्रण में रहेगी। बाजार में और वित्तीय संस्थानों के पास धन की कमी नहीं है। विदेशी निवेशक यहां कभी भी लौट सकते हैं।

 

शेयर बाजार अभी तुरंत उबरने वाला नहीं है। यह बुरा हुआ कि निवेशकों का धन डूबा है, लेकिन शेयरों के भाव अब एक तार्किक स्तर पर जा पहुंचे हैं। अब उनमें धीरे-धीरे तेजी आएगी। लेकिन पांच राज्यों के चुनावों के नतीजे क्या होंगे, इस पर भी काफी कुछ निर्भर करेगा। फिलहाल बाजार से थोड़ी दूरी बनाए रखने में ही भलाई है। आनन-फानन में पैसे बनाने की चाहत रखने वालों के लिए यह बाज़ार खतरे से भरा है, तो दीर्घकालीन निवेश करके बैठने वालों को यह रिटर्न देगा ही। 

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