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आखिर क्यों सिकुड़ रही है माकपा की जमीन

Mon, 12 May 2014 07:40 PM IST
कृपाशंकर चौबे
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माकपा चुनाव को युद्ध मानती है, पर सोलहवीं लोकसभा चुनाव में वह इसे युद्ध के रूप में लड़ती नजर नहीं आई। माकपा की स्थानीय कमेटी से लेकर क्षेत्रीय, जिला और राज्य कमेटियों द्वारा चुनाव प्रचार के लिए जो जज्बा दिखाए जाने की जरूरत थी, वह नहीं दिखाया गया। पश्चिम बंगाल और केरल की सत्ता से माकपा तीन साल से बाहर है, इसीलिए दोनों प्रदेशों में बड़े पैमाने पर कैडर पार्टी छोड़ रहे हैं। बंगाल के हर जिले में माकपा कैडर बड़ी संख्या में तृणमूल कांग्रेस में शामिल हुए हैं। संसदीय चुनाव से ठीक पहले बंगाल माकपा के वरिष्ठ नेता रज्जाक मोल्ला द्वारा नई पार्टी बनाए जाने और उसमें उनके अनेक समर्थकों के शामिल होने और लक्ष्मण सेठ द्वारा माकपा विरोध में मुखर होने से माकपा के बचे-खुचे कैडरों का मनोबल भी गिरा है। कभी माकपा के दिग्गज रहे सोमनाथ चटर्जी और सैफुद्दीन चौधरी पार्टी से बाहर हैं। पूर्व सांसद अनिल बसु को भी पार्टी ने बहिष्कृत कर रखा है। ऐसे में, यह वाम पार्टी पहले से कमजोर हुई है।
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माकपा नए लोगों को नेतृत्व का अवसर देकर जनता से जुड़ने की ईमानदार कोशिश कर सकती थी। नए चेहरे पार्टी की नई छवि का निर्माण कर सांगठनिक बदलावों की दिशा भी तय कर सकते थे। लेकिन न वह सांगठनिक बदलाव के रास्ते चलने को तैयार हुई, न उसने अपनी गलतियां सुधारीं। बंगाल में आज भी माकपा के सबसे बड़े प्रचारक बुद्धदेव भट्टाचार्य हैं, जिन्हें सिंगुर-नंदीग्राम के बाद खलनायक माना जाता है। वहां बुद्धदेव और विमान बोस तथा केरल में विवादास्पद विजयन के नेतृत्व में जनता का खोया विश्वास पाने की उम्मीद बेमानी है। एफडीआई जैसा मुद्दा तृणमूल कांग्रेस ने माकपा के हाथ से छीन लिया है। बंगाल के अस्पतालों में शिशुओं की मौत, आमरी अस्पताल हादसा, जहरीली शराब का मामला, सारधा चिटफंड घोटाले, बलात्कार की बढ़ती घटनाओं जैसे मामलों में माकपा ममता सरकार को घेर सकती थी। वह सांप्रदायिकता-विरोधी अभियान तेज कर जनता में उसे असरदार तरीके से पहुंचा सकती थी। यह चुनाव वामपंथ की जिम्मेदारियों की अग्नि परीक्षा इसलिए भी था, क्योंकि यह ऐसे समय हुआ, जब पूंजीपति और फासीवादी शक्तियों का गठजोड़ तैयार हो गया, जिसमें मीडिया की भूमिका भी प्रशंसनीय नहीं रहीं। विगत दो दशकों में किसानों, आदिवासियों, दलितों, अल्पसंख्यकों, महिलाओं एवं श्रमिक वर्ग की मुसीबतें बढ़ी हैं। धनिकों एवं वंचितों के बीच खाई चौड़ी हुई है और देश की बहुलतावादी संस्कृति खतरे में है।

माकपा देश को यह बताने में नाकाम रही कि विकास का नव उदारवादी मॉडल कॉरपोरेट जगत की हिफाजत करता है। सामाजिक कार्यकर्ता रोहिणी हेंसमेन की उस रिपोर्ट को हथियार बनाने का भी उसने प्रयास नहीं किया, जो बताती है कि गुजरात में निजी कंपनियों को बड़े पैमाने पर जो जमीन आवंटित की गई, उससे लाखों किसान, मछुआरे, चरवाहे, खेतिहर, मजदूर, दलित व आदिवासी बेघर हो गए। गरीबी, भूख, अशिक्षा और असुरक्षा से मुसलमानों की हालत बुरी है। इसका असली कारण है, मजदूरी की कम दर, कुपोषण घटाने के उद्देश्य से शुरू की गई योजनाओं को ठीक से लागू न किया जाना, पेयजल की कमी और साफ-सफाई का अभाव।
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लोकसभा चुनाव के बीच असम में सांप्रदायिक हिंसा भड़की। उसके कारणों को जिस ढंग से उठाया जाना चाहिए था, माकपा नहीं उठा पाई। पहले उत्तर प्रदेश, पंजाब, बिहार में भी वह एकाध सीटें पा जाती थी, अब तो अपने पुराने गढ़ पश्चिम बंगाल, केरल तथा त्रिपुरा में ही चुनिंदा सीटों पर उसे संतोष करना होगा। चिंतनीय यह है कि इस चुनाव में माकपा उन्हीं सीटों पर उम्मीद कर रही है, जहां गैर वाम दलों के वोट आपस में बंट रहे हैं।
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