शास्त्रीय गायक के भरोसे यह काम छोड़ा गया है कि वह जोगी को जाने न दे। गायक गा रहा है जोगी, मत जा...। उसने ढंग से आलाप भी नहीं लिया है कि जोगी यह जा...वह जा...! जोगी कोई गाना सुनने तो आया नहीं है कि पूरे तीन घंटे की बैठक सुनकर ही उठेगा।
अगर जोगी को रोकना ही था, तो शंकर महादेवन जैसे किसी गायक को पकड़ना था, जो ब्रेथलेस होकर गा भी देता और अपनी बात भी पूरी कर देता, फिर भले ही आधे घंटे तक हांफता ही क्यों न रहे। शास्त्रीय संगीत का काम शैतान से उलटा होता है, एकदम धीरजवाला। गायक तो अपनी उसी अदा से गाएगा, जोगी को सुनना हो तो सुने...न सुनना हो, तो निकल ले।
जोगी मत जा में सब कुछ गड़बड़ है। ढंग की तो एक भी बात नहीं है। बताइए, जोगी है, तो वह जाएगा ही। जोगी अगर यों शास्त्रीय गायकों की चाल चलने लगा, तो हो लिया जोगी! सवाल यह भी है कि जोगी को यों रोका क्यों जा रहा है। क्या पहले भी जोगी किसी के कहने पर रुका है? और अगर रुक गया, तो काहे का जोगी! उससे तो गृहस्थ ही अच्छे कि चोरी-छिपे ही सही, घर से जब-तब भाग तो लेते हैं।
मुझे तो शक है कि जिसे रोका जा रहा है, वह रंगरूट जोगी है। वरना यों बैठाकर जोगी, मत जा सुनाने की कोशिश ही कोई क्यों करता। क्या गानेवाला इतना खराब गा रहा है कि जोगी जाने के लिए दंड-कमंडल लिए खड़ाऊं पर सवार हो गया है? एक तो पक्का गाना सुना रहे हो...ऊपर से कह भी रहे हो कि जोगी, मत जा।
जोगी को रोककर आप कर क्या लेंगे? ऐसा कौन-सा काम अटका पड़ा है कि आप उससे ‘मत जा’ कह रहे हैं। मध्यावधि चुनाव भी पास नहीं है...फिर जोगी का वोट कोई गिनता भी कहां है! ...और आप हैं कि पीछे ही पड़ गए हैं। रोकना ही है, तो ‘मुन्ने के बापू मत जा’ या ‘मुनिया के पप्पा मत जा’ गाया जाना चाहिए। अब जोगी के न आगे नाथ न पीछे पगहा। तो ऐसे शख्स का रुकना क्या और जाना क्या!
बात का खुलासा भी कुछ नहीं है और आधे घंटे से वही कैसेट-सीडी बज रही है कि जोगी, मत जा। इसमें जोगी का वर्जन नहीं है कि क्यों न जाऊं। कहीं चैन नहीं लेने देता है यह जालिम जमाना। गाने वाले गाते रहते हैं और जोगी हैं कि चले जाते हैं। जोगी भी इस बात से तो खुश होते ही होंगे कि उन्हें भी कोई रोकने वाला है, वरना आजकल तो पति घर से निकल जाए, तो पत्नी भी मनाने नहीं आती कि ‘मत जा।’