राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) का गठन मुंबई में हुए आतंकी हमले (26/11) के बाद 2008 के एनआईए एक्ट के तहत किया गया था। शुरू में इसकी मुख्य भूमिका भारत में आतंकी घटनाओं की जांच करना थी और इसे केंद्रीय स्तर के आतंकवाद विरोधी कानूनों की प्रवर्तन एजेंसी के रूप में नामित किया गया था। इसे संबंधित राज्यों से बिना विशेष अनुमति लिए राज्य में आतंकवादी घटनाओं से निपटने के लिए सशक्त बनाया गया था और यदि ऐसी घटनाएं सैन्य छावनियों में हों, तो उसे भी इसमें शामिल किया गया था।
इसकी सजा की दर 95 फीसदी है, जिससे स्वतः सिद्ध है कि एजेंसी प्रभावी है। जम्मू-कश्मीर में एनआईए ने प्रवर्तन निदेशालय के साथ मिलकर हवाला लेनदेन पर अंकुश लगाया है, जो आतंकवादी गतिविधियों के वित्तपोषण का मुख्य स्रोत रहा है। उसका संयुक्त नतीजा यह रहा कि हुर्रियत अप्रभावी हो गया, पत्थरबाजों को धन मिलना कम हो गया और घाटी में बंद व हड़ताल मुक्त वातावरण बनाया गया। पत्थरबाजों की पहचान करने में वे सबसे आगे थे, जिसके कारण ऐसी घटनाओं में कमी आई। एनआईए द्वारा जिन आतंकी घटनाओं की जांच की गई, उनके निष्कर्षों के चलते आतंकियों को अपनी गतिविधियों के तौर तरीके में बदलाव लाना पड़ा है।