फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

एनआईए पर सियासत की बजाय इसे पेशेवर और सम्मानित एजेंसी बनाया जाए

हर्ष कक्कड़ Published by: हर्ष कक्कड़ Updated Thu, 18 Jul 2019 03:21 AM IST
विज्ञापन
विज्ञापन
NIA - फोटो : File Photo

राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) का गठन मुंबई में हुए आतंकी हमले (26/11) के बाद 2008 के एनआईए एक्ट के तहत किया गया था। शुरू में इसकी मुख्य भूमिका भारत में आतंकी घटनाओं की जांच करना थी और इसे केंद्रीय स्तर के आतंकवाद विरोधी कानूनों की प्रवर्तन एजेंसी के रूप में नामित किया गया था। इसे संबंधित राज्यों से बिना विशेष अनुमति लिए राज्य में आतंकवादी घटनाओं से निपटने के लिए सशक्त बनाया गया था और यदि ऐसी घटनाएं सैन्य छावनियों में हों, तो उसे भी इसमें शामिल किया गया था।

इसकी सजा की दर 95 फीसदी है, जिससे स्वतः सिद्ध है कि एजेंसी प्रभावी है। जम्मू-कश्मीर में एनआईए ने प्रवर्तन निदेशालय के साथ मिलकर हवाला लेनदेन पर अंकुश लगाया है, जो आतंकवादी गतिविधियों के वित्तपोषण का मुख्य स्रोत रहा है। उसका संयुक्त नतीजा यह रहा कि हुर्रियत अप्रभावी हो गया, पत्थरबाजों को धन मिलना कम हो गया और घाटी में बंद व हड़ताल मुक्त वातावरण बनाया गया। पत्थरबाजों की पहचान करने में वे सबसे आगे थे, जिसके कारण ऐसी घटनाओं में कमी आई। एनआईए द्वारा जिन आतंकी घटनाओं की जांच की गई, उनके निष्कर्षों के चलते आतंकियों को अपनी गतिविधियों के तौर तरीके में बदलाव लाना पड़ा है।



हाल में बांग्लादेश सीमा पर बम और अवैध हथियार निर्माण इकाइयों के उभरने की खबरें आई हैं। कुछ का भंडाफोड़ भी हुआ है। उनकी मौजूदगी भारत और बांग्लादेश, दोनों के लिए खतरा है, क्योंकि अल कायदा और आईएसआईएस वहां अपना पांव जमाना चाहते हैं। भारत बांग्लादेश के आतंकवादियों के लिए हथियारों का स्रोत नहीं हो सकता है। बाद में ये भारत स्थित आतंकवादियों के लिए भी हथियारों का निर्माण शुरू कर देंगे।

भारत के भीतर श्रीलंका की तरह के हमलों की सूचनाएं खुफिया एजेंसियों को मिली हैं। भारत में अप्रमाणित नागरिक बढ़ रहे हैं। खाड़ी के देशों में बसे अनिवासी भारतीयों (जो अंतरराष्ट्रीय आतंकी समूहों के समर्थक बन गए हैं) से उन्हें भारत के भीतर हमलों की योजना बनाने के लिए निरंतर धन मिलने की भी सूचना है।

विज्ञापन

NIA - फोटो : File Photo
राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) का गठन मुंबई में हुए आतंकी हमले (26/11) के बाद 2008 के एनआईए एक्ट के तहत किया गया था। शुरू में इसकी मुख्य भूमिका भारत में आतंकी घटनाओं की जांच करना थी और इसे केंद्रीय स्तर के आतंकवाद विरोधी कानूनों की प्रवर्तन एजेंसी के रूप में नामित किया गया था। इसे संबंधित राज्यों से बिना विशेष अनुमति लिए राज्य में आतंकवादी घटनाओं से निपटने के लिए सशक्त बनाया गया था और यदि ऐसी घटनाएं सैन्य छावनियों में हों, तो उसे भी इसमें शामिल किया गया था।

इसकी सजा की दर 95 फीसदी है, जिससे स्वतः सिद्ध है कि एजेंसी प्रभावी है। जम्मू-कश्मीर में एनआईए ने प्रवर्तन निदेशालय के साथ मिलकर हवाला लेनदेन पर अंकुश लगाया है, जो आतंकवादी गतिविधियों के वित्तपोषण का मुख्य स्रोत रहा है। उसका संयुक्त नतीजा यह रहा कि हुर्रियत अप्रभावी हो गया, पत्थरबाजों को धन मिलना कम हो गया और घाटी में बंद व हड़ताल मुक्त वातावरण बनाया गया। पत्थरबाजों की पहचान करने में वे सबसे आगे थे, जिसके कारण ऐसी घटनाओं में कमी आई। एनआईए द्वारा जिन आतंकी घटनाओं की जांच की गई, उनके निष्कर्षों के चलते आतंकियों को अपनी गतिविधियों के तौर तरीके में बदलाव लाना पड़ा है।

हाल में बांग्लादेश सीमा पर बम और अवैध हथियार निर्माण इकाइयों के उभरने की खबरें आई हैं। कुछ का भंडाफोड़ भी हुआ है। उनकी मौजूदगी भारत और बांग्लादेश, दोनों के लिए खतरा है, क्योंकि अल कायदा और आईएसआईएस वहां अपना पांव जमाना चाहते हैं। भारत बांग्लादेश के आतंकवादियों के लिए हथियारों का स्रोत नहीं हो सकता है। बाद में ये भारत स्थित आतंकवादियों के लिए भी हथियारों का निर्माण शुरू कर देंगे।

भारत के भीतर श्रीलंका की तरह के हमलों की सूचनाएं खुफिया एजेंसियों को मिली हैं। भारत में अप्रमाणित नागरिक बढ़ रहे हैं। खाड़ी के देशों में बसे अनिवासी भारतीयों (जो अंतरराष्ट्रीय आतंकी समूहों के समर्थक बन गए हैं) से उन्हें भारत के भीतर हमलों की योजना बनाने के लिए निरंतर धन मिलने की भी सूचना है।

तमिलनाडु और केरल में हाल में हुई गिरफ्तारियों की सूचना इस ओर इशारा करती है। पाकिस्तान ने खालिस्तान आंदोलन को फिर से हवा देना शुरू कर दिया है। हालांकि यह अभी नवजात अवस्था में है, लेकिन अगर इसकी निगरानी नहीं की जाती, तो यह राज्य में विकास के लिए कठिन चुनौती बन सकता है। इसलिए आतंकवाद से जुड़े विभिन्न मुद्दों से निपटने के लिए एक समर्पित एजेंसी की आवश्यकता है।

भारत इस समय सीमा पार से एक नए तरह के खतरे का सामना कर रहा है। हाईब्रीड जंग युद्ध का एक नया रूप है, जिसका सामना भारत कर रहा है। इसमें दुश्मन सेना गैर राज्यीय किरदार (नॉन-स्टेट ऐक्टर्स) और साइबर रणनीति का इस्तेमाल करती है। इसके बहुमुखी होने के कारण इससे निपटने के लिए कई एजेंसियों की भागीदारी की जरूरत होती है। बेशक सशस्त्र बल साइबर, अंतरिक्ष और विशेष बलों की नवगठित त्रि-सेवा कमांड के साथ मिलकर सैन्य पहलुओं से निपटेंगे, लेकिन कई अन्य तरह के खतरे भी बढ़ रहे हैं, जिन्हें समान महत्व देने की जरूरत है। यहीं पर एनआईए की भूमिका शुरू होती है।

लोकसभा द्वारा पारित विधेयक में एनआईए के दायरे में नए अधिनियमों को लाया गया है। इनमें परमाणु ऊर्जा अधिनियम, विमान अपहरण विरोधी अधिनियम और गैरकानूनी गतिविधियों की रोकथाम से संबंधित अधिनियम के तहत अपराध शामिल हैं। ये सभी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े हैं और आतंकवाद से भी जुड़े होंगे।

इन नए कानूनों का यह अर्थ है कि एनआईए अब कई विषयों के तहत मामलों की जांच में सक्षम होगी, जो एक साथ आतंकवादी हमलों का कारण बनते हैं। पहले ऐसा नहीं था। यह एनआईए अधिकारियों को पुलिस अधिकारियों की शक्ति प्रदान करता है, इस प्रकार यह कानून उन्हें संदिग्धों को गिरफ्तार करने और हिरासत में लेने में सक्षम बनाता है।

मानव तस्करी का समावेश अब भी मौन प्रश्न बना हुआ है, क्योंकि कई मामलों में यह आतंकवाद से जुड़ा हुआ नहीं होता है। हालांकि, इसका दूसरा पक्ष यह है कि ऐसी घटनाओं में अंतरराज्यीय गिरोह शामिल होते हैं, जिनसे निपटना स्थानीय पुलिस के बजाय एनआईए के लिए आसान है। नकली मुद्रा राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने और आतंकवाद की फंडिग का एक प्रमुख साधन थी, जिसे पिछली सरकार द्वारा की गई नोटबंदी से बड़ा झटका लगा। नकली मुद्रा का प्रवाह फिर से देश में होने लगेगा।

साइबर आतंकवाद हमेशा खतरा रहा है और भविष्य में बढ़ेगा ही। ये उभरते हुए खतरे आतंकवाद के ही दूसरे रूप हैं, जिसे एक वैसी एजेंसी द्वारा नियंत्रित किया जाना चाहिए, जो पहले से स्थापित है और आतंकवादी घटनाओं की जांच में जिसे विशेषज्ञता है। यह संशोधन केंद्र सरकार को एनआईए के लिए विशेष अदालतों के रूप में सेशन कोर्टों को नामित करने में सक्षम बनाता है।

नया बिल एनआईए को विदेशों में भारतीय प्रतिष्ठानों पर आतंकी हमलों की जांच करने में भी सक्षम बनाता है। अफगानिस्तान में भारतीय वाणिज्य दूतावासों पर ऐसे कई हमले हुए, पर वे अफगान पुलिस द्वारा जांच पर निर्भर थे। अब एनआईए जांच, आरोपपत्र दायर करने और अपराधियों को सजा दिलाने के लिए अन्य एजेंसियों के साथ मिलकर काम कर सकेगी।

नए विधेयक का विरोध करते हुए विपक्षी दलों ने कहा कि सरकार किसी खास धर्म पर निशाना साधने के लिए संशोधन कर रही है, लेकिन इसे गृह मंत्री ने सिरे से खारिज कर दिया। यह याद रखना चाहिए कि ऐसी एजेंसियों को मजबूत बनाना फायदेमंद होता है, पर उसके दुरुपयोग की आशंका भी बनी रहती है। 2008 के मालेगांव विस्फोट मामले में एनआईए के दुरुपयोग की हमेशा शिकायतें थीं। वर्तमान में यह मामला अदालत में विचाराधीन है।

इस पूरे संदर्भ में मेरा मानना है कि आतंकवाद के सभी रूपों से निपटने वाली प्रमुख एजेंसी के रूप में एनआईए को मजबूत बनाया जाना चाहिए। इस विधेयक ने बस यही किया है। साथ ही यह भी सुनिश्चित करने की जरूरत है कि समुदायों और राजनीतिक विरोधियों पर निशाना साधने के लिए इसकी शक्तियों का दुरुपयोग नहीं किया जाएगा। इस एजेंसी को राजनीतिक हथियार बनाने के बजाय पेशेवर और सम्मानित बनाया जाना चाहिए।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next