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राजनीति क्यों तय करती है कि कैसा हो इतिहास

Fri, 05 Sep 2014 08:26 PM IST
उदय प्रकाश अरोड़ा
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केंद्र में नई सरकार बनते ही इतिहास से छेड़खानी शुरू हो गई है। इतिहास की सरकारी संस्था भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद का पुनर्गठन हो रहा है। गुजरात के स्कूलों में राष्ट्रीय स्वाभिमान जागृत करने के उद्देश्य से छह नई पाठ्यपुस्तकें विगत 30 जून से पाठ्यक्रम में शामिल की गई हैं। ऐसा नहीं है कि इतिहास के पाठ्यक्रम में बदलाव पर विवाद इसी समय छिड़ा है। पहले भी सरकारें बदलने पर शिक्षा जगत की वास्तविक समस्याओं की उपेक्षा करते हुए इतिहास के पाठ्यक्रम बदलने में तत्परता दिखाई जाती रही है। आखिर ऐसा इतिहास के साथ ही क्यों? इतिहास भी एक सामाजिक विज्ञान है। इसके अपने सिद्धांत, नियम और सीमाएं हैं, जिनसे वह संचालित होता है। लेकिन इन सबको नकारकर अब राजनीति यह तय करने लगी है कि किस तरह का इतिहास पढ़ाया जाए।
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यह समस्या सिर्फ हिंदुस्तान में नहीं है। दूसरे देशों में भी इतिहास अनेक विवादों और समस्याओं के मूल में रहा है। वस्तुतः यह सब आधुनिक राष्ट्रवाद के उदय के साथ प्रारंभ हुआ है। राष्ट्रों ने आत्ममुग्ध होकर जब अपने-अपने नायकों, राजाओं और विजेताओं को महिमामंडित करना शुरू किया, तब इतिहास की वैज्ञानिक सूझ-बूझ खत्म होने लगी। अंधराष्ट्रवाद ने तो आस्था, मिथक और इतिहास के बीच अंतर ही समाप्त कर दिया। एक राष्ट्र में जो नायक पूजित था, वह दूसरी जगह तिरस्कृत हो गया। जिन्ना यदि पाकिस्तान में नायक बना, तो भारत में खलनायक। इसी तरह, तैमूर भारत में लुटेरे आक्रमणकारी के रूप में देखा गया, तो नवोदित राष्ट्र उज्बेकिस्तान में उसे राष्ट्रपिता का दर्जा मिला। सिकंदर ने एशिया में खूब तबाही मचाई, लेकिन आधुनिक यूनानी उसे भारत सहित एशिया के विभिन्न देशों में सभ्यता के प्रचारक के रूप में देखते हैं। इसी तरह इतिहास के अवैज्ञानिक दृष्टिकोण ने न केवल राष्ट्रीय स्तर पर, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी विभिन्न समुदायों के बीच भेदभाव और झूठ को बढ़ावा दिया है।

ऐसी स्थिति में इतिहास की शिक्षा एक बड़ी समस्या बन जाती है। उच्च शिक्षा के विद्यार्थियों को तो पता होता है कि उनके पास आ रही सूचनाओं का स्रोत क्या है। पर बच्चे तो किताबों में दर्ज सूचनाओं को शत-प्रतिशत सच मानते हैं। ऐसे में, राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण पाठ्यपुस्तक लिखने वाला यदि किसी खास मत से जुड़ा होगा, तो वह उसी प्रकार की सूचनाएं पेश करेगा, जिनसे उसकी विचारधारा का समर्थन होता हो।
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दुखद यह है कि अपने देश में सारा विवाद इस बात को लेकर है कि इतिहास धर्मनिरपेक्ष पढ़ाया जा रहा है अथवा सांप्रदायिक। इसकी चिंता किसी को नहीं है कि स्कूली स्तर पर इस विषय को दिलचस्प कैसे बनाया जाए। जोर इतिहास की गुणवत्ता पर होना चाहिए, उसके सांप्रदायिक या धार्मिक होने पर नहीं। कुछ विद्वानों का मानना है कि बच्चों को तथ्य बताने के बजाय यह बताया जाए कि तथ्यों का निर्माण कैसे होता है? अर्थात बच्चे इतिहास निर्माण की प्रक्रिया में भाग लें। जर्मनी के स्कूलों में द्वितीय विश्वयुद्ध से संबंधित अध्ययन के लिए जर्मन, ब्रिटेन, अमेरिका, जापान आदि के तत्कालीन अखबारों के अलग-अलग अंश प्रस्तुत कर विद्यार्थियों में सभी दृष्टिकोण की समझ विकसित की जाती है। अपने देश में भी सिक्कों के आधार पर, जो भारत में शासन करने वाले 40 से अधिक यूनानी राजाओं के बारे में जानने के लिए हमारा एकमात्र स्रोत है, बच्चों में इतिहास की समझ विकसित की जा सकती है। हमें समझना होगा कि आस्था, धर्म, भावना और मिथकों से इतिहास को जोड़कर अंधराष्ट्रवाद उत्पन्न करना अंततः विनाश की ओर ही ले जाएगा।
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