पिछले साल जून में मुख्य विपक्षी पार्टी के तौर पर भाजपा ने केंद्रीय सूचना आयुक्त (सीआईसी) के उस आदेश का समर्थन किया था, जिसमें राजनीतिक दलों को सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून के दायरे में लाने की बात थी, जबकि कांग्रेस और कुछ अन्य दलों ने सीआईसी के निर्देश को जोखिम भरा बताते हुए कहा था कि इससे लोकतांत्रिक संस्थानों को नुकसान पहुंचेगा। विगत 31 जुलाई को कार्मिक एवं प्रशिक्षण मंत्रालय के राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह ने राज्यसभा में लिखित जवाब देते हुए कहा कि राजनीतिक दलों को आरटीआई ऐक्ट के दायरे में लाने से उनके आंतरिक कामकाज में उलझन पैदा होगी। यही नहीं, राजनीतिक विरोधी इस कानून का दुरुपयोग कर सकते हैं, जिससे पार्टियों के कामकाज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
दिसंबर, 2008 में यूपीए सरकार ने बीमा कानून (संशोधन) विधेयक, 2008 राज्यसभा में पेश किया था। अन्य मुद्दों के साथ, यह विधेयक विदेशी निवेशकों को भारतीय बीमा कंपनी में 49 फीसदी तक पूंजी निवेश की अनुमति देता था। दोनों सदनों में विधेयक पेश किए जाने के बाद उसे वित्त मंत्रालय की स्थायी समिति के पास भेज दिया गया था। स्थायी समिति की रिपोर्ट दिसंबर, 2011 में पेश की गई। उस द्विदलीय समिति की अध्यक्षता भाजपा नेता यशवंत सिन्हा कर रहे थे, जिन्होंने बीमा क्षेत्र में उच्चतम सीमा के विदेशी निवेश का विरोध किया। रिपोर्ट में बताया गया कि मौजूदा आर्थिक परिदृश्य में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) में बढ़ोतरी भारतीय बीमा उद्योग के हित में नहीं है।
पर अपने बजट भाषण में अरुण जेटली ने बीमा क्षेत्र में 49 फीसदी एफडीआई के सरकारी फैसले की घोषणा की और 23 जुलाई को कैबिनेट ने संशोधन विधेयक पेश करने का निर्णय किया। इस पर कांग्रेस समेत नौ विपक्षी दलों ने राज्यसभा के सभापति को पत्र लिखकर कहा कि नरेंद्र मोदी सरकार जिस विधेयक को अपने पहले बड़े आर्थिक सुधार के रूप में पेश कर रही है, वह वस्तुतः वही विधेयक है, जिसे यूपीए सरकार ने पेश किया था, और उस विधेयक को संसद की प्रवर समिति के पास भेजा जाए। इन पार्टियों का दावा है कि बीमा विधेयक के सरकारी मसौदे में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं, जिसकी सर्वदलीय संसदीय समिति द्वारा समीक्षा करवाई जानी चाहिए। हालांकि भाजपा नेताओं ने इन आरोपों का खंडन करते हुए तर्क दिया कि यह विधेयक यूपीए सरकार के विधेयक के सभी व्यावहारिक उद्देश्यों को पूरा करता है, क्योंकि इसमें वर्तमान सरकार द्वारा प्रस्तावित मात्र 11 संशोधन शामिल हैं, जबकि 86 संशोधन पूर्ववर्ती कांग्रेस नीत यूपीए सरकार द्वारा प्रस्तावित हैं।
इन घटनाओं का जिक्र यहां भारतीय राजनीति की उस खास विशेषता को रेखांकित करने के लिए किया गया है कि भूमिका बदलने पर कैसे सत्तारूढ़ और विपक्षी दल महत्वपूर्ण मुद्दों पर पाला बदल लेते हैं। भाजपा जब तक विपक्ष में थी, वह राजनीतिक दलों को आरटीआई ऐक्ट के दायरे में लाने की इच्छुक थी, लेकिन सत्ता में आने के बाद वह इससे इन्कार कर रही है। हालांकि इस मुद्दे पर सत्ता से बाहर होने के बाद कांग्रेस का सार्वजनिक बयान अभी नहीं आया है, पर जब भी उसका बयान आएगा, कोई भी समझ सकता है कि वह राजनीतिक दलों को आरटीआई ऐक्ट के दायरे में लाने की मांग करेगी। यही स्थिति बीमा क्षेत्र में एफडीआई सीमा की है। जब यूपीए सरकार थी, तो भाजपा पूरी ताकत के साथ इसका विरोध कर रही थी। लेकिन आज यह विधेयक राजग सरकार का आर्थिक सुधार की दिशा में पहला बड़ा कदम बन गया है, जबकि इसे आगे बढ़ाने वाली कांग्रेस विरोध में खड़ी है।
साफ है कि राजनीतिक दलों की नीतियों में न तो निरंतरता है और न ही उनकी कोई निश्चित विचारधारा। लगता है, वे सरकार के प्रस्तावों में अड़ंगा लगाने और सरकारी कानूनों का मार्ग अवरुद्ध करने के हिसाब से अपना रुख बदलते रहते हैं। यानी विपक्ष एक गैर जिम्मेदार राजनीतिक ताकत के रूप में अपनी भूमिका को परिभाषित करता है, जो पहले तो सरकार के प्रस्ताव का विरोध करता है और फिर अपने फैसले को उचित ठहराने के लिए कारणों की तलाश करता है। वहीं विपक्षी दल जब सरकार में शामिल होता है, तो उसे सफाई देने की भी जरूरत महसूस नहीं होती। इस सरकार ने तो मीडिया के सवालों के लिए अपने दरवाजे बंद कर रखे हैं। वह एकतरफा संवाद में यकीन करती है। जहां तक मीडिया को सूचना देने की बात है, तो यह काम ट्वीट, प्रेस विज्ञप्ति या अन्य सोशल मीडिया के जरिये हो रहा है।
सत्ताधारी पार्टी और विपक्ष के बीच नजरिये में यह बदलाव जिस निरंतरता के साथ होता है, उसकी सच्चाई उघाड़ना ज्यादा चिंताजनक है। इस परिदृश्य के लिए वह सर्वव्यापी 'व्यवस्था' जिम्मेदार है, जिसमें निहित स्वार्थों के तहत यथास्थिति बनाए रखी जाती है, और जो आंशिक तौर पर नौकरशाही द्वारा, आंशिक तौर पर तमाम तरह की वैचारिकता वाले राजनेताओं द्वारा और आंशिक तौर पर अपने बूते चलती है। यह 'व्यवस्था' खुल्लमखुल्ला बाहरी तत्वों द्वारा प्रभावित होती है, जिनमें अंतरराष्ट्रीय लॉबिस्टों के अलावा उद्योग और पूंजी बाजार की ताकतें भी शामिल होती हैं। इसी 'व्यवस्था' की इच्छा है कि राजनीतिक दलों को आरटीआई के दायरे से बाहर रखा जाए और बीमा क्षेत्र में एफडीआई की सीमा 49 फीसदी तक बढ़ाई जाए। ऐसे में, यह समझने के लिए बहुत ज्यादा दिमाग लगाने की जरूरत नहीं है कि यह 'व्यवस्था' किसका हित साधती है और राजनीतिक दल यू-टर्न क्यों लेते हैं।
(वरिष्ठ पत्रकार और ‘नरेंद्र मोदी-द मैन, द टाइम्स’ के लेखक)