केंद्र सरकार की ओर से संकेत दे दिया गया है कि संसद के आगामी सत्र में सरकार आर्थिक आधार पर आरक्षण की नई श्रेणी के प्रावधान वाला विधेयक लाएगी। कुछ लोग आशंका जता रहे हैं कि आर्थिक आधार पर आरक्षण को सर्वोच्च न्यायालय जब पहले ही खारिज कर चुका है, तब ऐसा करने का मतलब क्या? पिछले वर्ष गुजरात सरकार द्वारा छह लाख वार्षिक आय वालों तक के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था को न्यायालय ने खारिज कर दिया था। राजस्थान सरकार ने 2015 में उच्च वर्ग के गरीबों के लिए 14 प्रतिशत और पिछड़ों में अति निर्धन के लिए पांच फीसदी आरक्षण की व्यवस्था की थी। उसे भी निरस्त कर दिया गया। हरियाणा सरकार का ऐसा फैसला भी न्यायालय में नहीं टिक सका। फिर क्या केंद्र सरकार का कदम न्यायालय में टिक पाएगा? गौरतलब है कि उन राज्यों ने अनुसूचित जाति-जनजाति तथा पिछड़े वर्ग को प्राप्त आरक्षण से कोई छेड़छाड़ न कर अलग से आरक्षण का प्रावधान किया था। केंद्र सरकार भी वही करने जा रही है।
गरीबी जाति देखकर नहीं आती। सामाजिक न्याय का सिद्धांत कहता है कि राज्य को उन सबको सामान्य जीवन जीने की स्थिति में लाना चाहिए, जो किन्हीं कारणवश पीछे रह गए हैं। चूंकि भारत में जातिगत भेदभाव भी गरीबी और पिछड़ेपन का प्रमुख कारण रहा है, इसलिए यहां जाति के आधार पर आरक्षण का प्रावधान लागू किया गया। किंतु इससे असंतोष भी पैदा हुआ है और समाज के अनेक वर्ग अलग-अलग राज्यों में आरक्षण की मांग के साथ उग्र आंदोलन कर रहे हैं। हालांकि कुछ जातियों को आरक्षित श्रेणी में डालने का भी विरोध होता है तथा न्यायालय भी उसे स्वीकार नहीं करती। यूपीए सरकार ने जाटों को अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल किया था, जिसे शीर्ष अदालत ने नकार दिया। अगर अभी तक घोषित पिछड़ी जातियों के अलावा अन्य जातियों के कमजोर लोगों को आरक्ष्ण के दायरे में लाना है, तो वर्तमान आरक्षण व्यवस्था को बनाए रखते हुए आर्थिक आधार की एक श्रेणी बनाने का रास्ता बचता है।
आर्थिक आधार पर आरक्षण के दो प्रयोग हुए हैं। बिहार में पिछड़ों को 27 प्रतिशत आरक्षण देने के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर ने आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्णों को तीन प्रतिशत आरक्षण दिया था। वह चलता रहा। नरसिंह राव सरकार ने आर्थिक आधार पर 10 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की थी, हालांकि शीर्ष अदालत ने उसे रद्द कर दिया। उसके साथ बिहार की व्यवस्था भी समाप्त हो गई। नरेंद्र मोदी सरकार के सामने ये सारे उदाहरण होंगे। उसके सामने दो मुख्य बाधाएं हैं। एक, सर्वोच्च न्यायालय ने आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत तय कर दी है। दूसरे संविधान में आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का प्रावधान नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 में केवल सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े होने की बात है। जहां तक 50 प्रतिशत सीमा की बात है, तो संसद विधेयक पारित कर इस सीमा को बढ़ा सकती है।
संविधान के वर्तमान प्रावधानों में आर्थिक आधार पर आरक्षण मान्य नहीं हो सकता। ऐसे में, संविधान संशोधन होगा, जिसके लिए दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत चाहिए। जिस प्रकार का वातावरण है, उसमें विपक्ष के समर्थन की उम्मीद है। जाट आरक्षण खत्म करने का फैसला देते हुए न्यायालय ने कहा था कि केवल जाति पिछड़ेपन का आधार नहीं हो सकता। यानी खुद शीर्ष अदालत भी मान रही है कि जातियों की श्रेणी के बाहर आरक्षण हो सकता है। समाज के असंतोष को दूर करने के लिए यह आवश्यक भी है।