नई सरकार के आते ही नई शिक्षा नीति का मसौदा देश के सामने है। मसौदे में विभिन्न पहलुओं पर चर्चा तो की गई है, पर विजन, मिशन एवं उद्देश्यों में तारतम्य की कमी है। ऐसा लगता है कि विभिन्न एजेंसियों से जो टिप्पणियां आईं, उनको समन्वयक ने बस एक साथ रख दिया है। त्रिभाषा फॉर्मूले का विरोध दक्षिण भारत एवं पश्चिम बंगाल में हुआ है। ऐसा लगता है कि जनता एवं उनके नुमाइंदे भाषा में ही उलझ गए। जबकि इसके बजाय जमीनी स्तर पर शिक्षा व्यवस्था, खासकर इंटरमीडिएट स्तर तक, किस तरह चल रही है और शिक्षा प्रणाली में किस तरह सुधार लाया जा सकता है, जिससे कि सामाजिक एवं आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के बच्चों को उचित शिक्षा मिले, इस ओर ध्यान देना ज्यादा जरूरी है।
ज्योतिबा फुले का कहना था कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए, जो मस्तिक को सशक्त कर, नैतिक मूल्यों को खत्म किए बिना उसे उसके परंपरागत धंधों से बाहर निकलकर पैसा कमाने योग्य बनाए। शिक्षा ऐसी हो, जो जाति व्यवस्था पर प्रहार कर उसमें फंसी विभिन्न जातियों के लोगों को गतिशील करे। इसमें दोराय नहीं कि संविधान के अनुच्छेद 45 के अनुसार, शिक्षा को संविधान का अंग और 2009 में संविधान में सशोधन कर शिक्षा को मौलिक अधिकार का दर्जा दिया गया। देश में साक्षरता बढ़ी है। लेकिन महिलाओं की साक्षरता दर पुरुषों से कम है।
सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे बच्चों को उचित शिक्षा नहीं मिल रही। इस तरह के स्कूलों में न पर्याप्त अध्यापक हैं, न जरूरी संरचनात्मक सुविधाएं। इस तरह की व्यवस्था को अति शुद्र वाली शिक्षा व्यवस्था कहेंगे। सरकारी मॉडल स्कूलों में पढ़ रहे बच्चों को सामान्य सरकारी स्कूल से ज्यादा सुविधाएं हैं और वहां अध्यापक भी अधिक हैं। इस तरह की शिक्षा व्यवस्था को शुद्रवादी शिक्षा व्यवस्था कहेंगे। नगर पंचायतों या बड़े गांवों के पब्लिक स्कूलों में ढांचागत सुविधाएं भी हैं और अध्यापक भी होते हैं।
इस शिक्षा व्यवस्था को वैश्य वाली शिक्षा व्यवस्था कहेंगे। शहरों के पब्लिक स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को सुविधाएं मिलती हैं और वहां अंग्रेजी भाषा का बोलबाला होता है। इस तरह की शिक्षा को क्षत्रियवादी शिक्षा व्यवस्था कहेंगे। बड़े-बड़े नगरों के पब्लिक स्कूलों में वे तमाम सुविधाएं होती है, जो शिक्षा के लिए जरूरी हैं। इस व्यवस्था को ब्राह्मणवादी शिक्षा कहेंगे।