हमारे देश के नेता जहां से सफल होकर लौटते हैं, उसे विदेश कहते हैं। गली-मुहल्ले में भले ही भद पिट जाए, मगर अंगोला से लेकर अमेरिका-फतह इनके लिए उलटे हाथ का खेल है। आजादी के बाद से जो भी नेता विदेश गया है, सफल ही लौटा है। जब जाते हैं, तभी यह लगने लगता है कि हो न हो, ये सफल होकर ही लौटेंगे। इसीलिए हमारे नेता विदेश जाने के लिए मचलते रहते हैं। कहने वाले तो यहां तक कहते हैं कि उन्हें उन देशों का नाम भी ठीक से मालूम नहीं होता, जहां से वे सफल होकर लौटते हैं। मगर मैं जानता हूं कि ये हमारे आदरणीय नेताओं को बदनाम करने का षड्यंत्र है। यह भी अच्छी बात है कि हमारे नेता इस तरह की अफवाहों पर ध्यान न देते हुए अपनी विदेश यात्रा की सफलता का भरपूर आनंद लेते हैं।
नेता बनते ही विदेश जाने की गौरवशाली परंपरा रही है। अपने देश में कहीं जाना हो, तो ये नेता हलकान हो जाते हैं। एक तो धूल, धुआं और ऊपर से स्थानीय राजनीति में अपने-पराए दुश्मन। अपने ही दल के दो नेताओं को एक साथ बिठा पाने में विफल नेता जब विदेश जाता है, तो न जाने किस-किस को साथ बिठा लेता है या किस-किसके साथ बैठ लेता है।
वैसे तो विरोधी दल सरकार की विफलता पर आसमान सिर पर उठाते रहते हैं, मगर जब विदेश यात्रा का मामला आता है, तो उन्हें गड़बड़ कम ही नजर आती है। इसीलिए विदेश से आए नेता के बारे में चुप ही रहा जाता है। पर यहां भी एक पेच है। जो विदेश से लौट आता है, उसकी यात्रा तो सफल, मगर जो विदेश मंत्री बन जाता है, वह चाहे जितनी फॉरेन ट्रिप कर ले, सफल नहीं होता।
मैं सोच रहा हूं, यदि हवाई जहाज का आविष्कार न होता, दूसरे देशों में जाने की परंपरा न होती, तो बहुतेरे राजनेता मंत्री बनना शायद पसंद भी न करते। आखिर वे सफल तो विदेश यात्राओं में ही होते हैं। इसका दूसरा पक्ष यह कि सफलता के लिए और कुछ भले ही न करना पड़े, मगर विदेश तो जाना ही पड़ता है। वही हमारे नेता कर रहे हैं और आगे भी करते रहेंगे। वे कहीं तो सफल हों आखिर!