अरविंद केजरीवाल ने सरकार बनाने के लिए कांग्रेस और भाजपा के सामने 18 शर्तें रखी थीं, जिस पर कांग्रेस ने जवाब दे दिया है। अब वह इस पर फिर से लोगों की राय ले रहे हैं। ये 18 शर्तें क्या हैं, इससे अधिक महत्व इस बात का है कि वह एक बात क्या है, जिस कारण 'आप' सरकार बनाए ही, ऐसा लगता है?
जैसी राजनीति हमें पढ़ाई व सिखाई गई है, उसके दो तकाजे हैं- हर जागरूक आदमी को किसी न किसी राजनीतिक दल का सदस्य बनना चाहिए और राजनीतिक दल का एक ही लक्ष्य है कि उसे चुनाव लड़ना चाहिए और सरकार बनानी चाहिए। कई बार सोचता हूं कि देश के पटल पर अगर 1974 से 1977 का दौर न आया होता, तो कितने महान नेता अनाम ही मर जाते! इनमें से कोई भी ऐसा नहीं था, जिसने सपने में भी वैसा चुनाव लड़ने के बारे में सोचा होगा, जैसा 1977 में लड़ा गया; और इनमें से शायद ही किसी को यह इल्म रहा होगा कि वे प्रधानमंत्री या उप प्रधानमंत्री या केंद्र में कोई मंत्री पद संभालेंगे। यह सब होते और मिटते हमने देखा है।
1977 से पहले जो पार्टी किसी की कल्पना में नहीं थी और 1977 में जिसे बनाने में किसी की दिली दिलचस्पी नहीं थी, वह बनी और चली, और ऐसी चली, जैसी कभी कोई पार्टी चली ही नहीं थी। सांसदों के दोनों कारखानों, बिहार और उत्तर प्रदेश, में कांग्रेस को वैसी झाड़ू कभी लगी ही नहीं थी, जैसी 1977 में लगी। उसे इन दोनों राज्यों में एक भी सीट नहीं मिली थी। दो तिहाई बहुमत से तब जनता पार्टी सत्ता में आई थी। अपनी-अपनी राजनीतिक कब्रों में बैठे सारे ही लोग दिल्ली और राज्यों की कुर्सियों पर जा बैठे थे। और फिर कमाल देखिए कि दो साल होते-होते वह पार्टी सत्ता से ही नहीं गई, अस्तित्व से भी गई। आज उसका पिंडदान करने वाला भी कोई नहीं बचा है।
हम सभी चाहते हैं कि जनता पार्टी का जैसा हाल हुआ, वैसा आप का न हो। इसलिए सारे सुजान आप को सुझाव दे रहे हैं कि उसने चुनाव लड़ा है और सरकार बनाने की स्थिति बनी है, तो उसे सरकार बनानी ही चाहिए। आप इस हैरतअंगेज सच्चाई को देखिए कि कांग्रेस आप से कह रही है कि आखिर वह अपनी जिम्मेदारी से कैसे भाग सकती है? जैसे सरकार बनाना किसी भी राजनीतिक दल की नैतिक व आध्यात्मिक जिम्मेदारी हो! ऐसा बिल्कुल भी नहीं है, हर्गिज नहीं। लेकिन दिल्ली में पेच भी ऐसा ही फंसा है कि सबके होश गुल हैं। भाजपा को दिन में तारे नजर आ रहे हैं, क्योंकि कुर्सी चाहिए भी, कुर्सी सामने है भी, लेकिन बैठना नहीं हो पा रहा है। आप भी वैसी ही हालत में है कि वह चाहती तो है कि सरकार बनाए, लेकिन बात बन नहीं रही है। मुझे लगता है कि आप को इस असंभव को संभव करना चाहिए और वह हो सकता है।
आप को सरकार बनाने का आमंत्रण मिला है, जबकि उसे बुलाने वाला भी जानता है कि आप के साथ बहुमत नहीं है। फिर आपने ऐसा आमंत्रण दिया क्यों? संविधान के शब्दों और उसकी आत्मा के रक्षक बने हैं आप, तो संविधान विरोधी काम करने की इच्छा लोगों में जगे, ऐसा प्रस्ताव कैसे कर सकते हैं? फिर भी उपराज्यपाल ने ऐसी जंग छेड़ ही दी है, तो मुझे लगता है कि आप को सरकार बनानी ही चाहिए। आप को सबसे पहले अपने सारे पत्ते देश के सामने खोल कर रख देने चाहिए। बता देना चाहिए कि सरकार बनाने लायक पत्ते उसके पास नहीं है, और किसी भी रास्ते से अपने पत्तों की संख्या बढ़ाने वाली नहीं है। मतलब वह चलाएगी, तो अल्पमत सरकार ही चलाएगी। और अल्पमत की उसकी सरकार करेगी क्या? अपना चुनाव घोषणा पत्र लागू करेगी बस।
उसे देश को बता देना चाहिए कि चुनाव घोषणा पत्र में जो नहीं है, ऐसा कोई भी काम वह पहले वर्ष में नहीं करेगी। उसे कह देना चाहिए कि उसका घोषणा पत्र खुला दस्तावेज रहा है और इसी आधार पर उसे जनता का इतना बड़ा समर्थन मिला है। इसका सीधा मतलब है कि वह नैतिक रूप से उससे बंधी हुई है और राजनीतिक नैतिकता का तकाजा है कि उसे जब भी मौका मिले, तो वह अपने वायदे पूरे करे। भाजपा ने सरकार बनाने से मना कर दिया है और कांग्रेस ने उसे बेशर्त समर्थन देने की घोषणा की है, तो वह सरकार बनाने को तैयार है और वह अब दिल्ली की विधानसभा में उपस्थित सारे दलों का बेशर्त समर्थन-सहयोग मांगती है। सिर्फ एक ही शर्त उसे स्वीकार्य है और वह यह कि वह अपने चुनाव घोषणा पत्र के बाहर का कोई काम हाथ में नहीं लेगी।
वह देश को अभी से ही बता दे कि जब भी उसके रास्ते में कोई बाधा खड़ी की जाएगी या उसके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया जाएगा, वह अपना बचाव करने या अपना बहुमत साबित करने नहीं जाएगी, क्योंकि जो है नहीं, वह उसे साबित कैसे कर सकती है! इसलिए अपना कार्यक्रम लागू करने से उसे रोकने की या उसके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की परिस्थिति जिस भी दल की तरफ से या दलों के गठजोड़ की तरफ से आएगी, तो वह त्यागपत्र देकर, सीधा दिल्ली की जनता के बीच जाएगी और उससे पूरा जनादेश मांगेगी। इस तरह दिल्ली की जनता के आदेश का अपमान करने की और उन्हें चुनाव में फिर से झोंकने की पूरी जिम्मेदारी उनकी होगी, जो जोड़-तोड़कर सरकार गिराने की कोशिश में होंगे। दिल्ली को फिर से चुनाव झेलने की पीड़ा इस कारण नहीं हो रही है कि आप ने अपनी जिम्मेदारी पूरी करने की कोशिश नहीं की, बल्कि इसलिए हो रही है, बाकी सारे राजनीतिक दलों ने उसे सहयोग नहीं दिया।
यह वैधानिक जिम्मेदारी के निर्वाह का नया ही स्वरूप होगा, जिसमें दोनों संभावनाएं हैं-सरकार चले और सभी दल जनहित के कामों में सहायक बनें; सरकार नहीं चले और सभी फिर से चुनाव में उतरें। दोनों ही स्थितियों में आम आदमी पार्टी के पास खोने के लिए कुछ नहीं और पाने के लिए आसमान है।