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दूसरा पहलू: अत्याधुनिक विमान क्यों हो रहे क्रैश? हादसों के पीछे तकनीकी खामी या कुछ और...

क्रिस्टल झांग Published by: दीपक कुमार शर्मा Updated Wed, 19 Feb 2025 06:09 AM IST

सार

यह तकनीक पायलटों को संभावित टकराव के प्रति सचेत करती है, ताकि पायलट विमान को ऊपर या नीचे कर या दिशा मोड़कर हादसे को टाल सकें। टीसीएएस तकनीक की कुछ सीमाएं भी हैं। लगभग 300 मीटर ऊंचाई से नीचे विमान के उड़ने पर टीसीएएस ठीक से काम नहीं करती। हादसे के वक्त यात्री विमान 90 व सैन्य विमान 60 मीटर की ऊंचाई पर थे।
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क्रिस्टल झांग और सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला


बाहरी एयर ट्रैफिक कंट्रोल सिस्टम से स्वतंत्र रूप से संचालित इस प्रणाली को कभी-कभी एयरबोर्न कॉलिजन अवॉइडेंस सिस्टम (एसीएएस) भी कहा जाता है, जो पायलटों को पास के विमानों और संभावित टकराव के प्रति तुरंत सचेत करती है, ताकि पायलट विमान को ऊपर या नीचे कर या फिर उसकी दिशा मोड़कर हादसे को टाल सकें। ये नई प्रणालियां एक-दूसरे से संवाद करने में भी सक्षम हैं। वर्ष 1974 में विकसित हुई यह तकनीक धीरे-धीरे उन्नत होती गई। व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए उपयोग किए जाने वाले किसी भी विमान को शिकागो कन्वेंशन के तहत अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुसार, टीसीएएस से सुसज्जित होना चाहिए। लेकिन अमेरिकी सैन्य हेलिकॉप्टर इस नियम के तहत नहीं आते। इसलिए रोनाल्ड रीगन वाशिंगटन नेशनल एयरपोर्ट पर टकराए सैन्य हेलिकॉप्टर में टीसीएएस प्रणाली नहीं थी।

 

टीसीएएस तकनीक की कुछ सीमाएं भी हैं। लगभग 300 मीटर ऊंचाई से नीचे विमान के उड़ने पर टीसीएएस ठीक से काम नहीं करती। बताया जाता है कि जब हादसा हुआ, तब अमेरिकी एयरलाइंस के विमान की अंतिम ऊंचाई करीब 90 मीटर और सैन्य हेलिकॉप्टर की ऊंचाई 60 मीटर के आसपास थी। इतनी कम ऊंचाई पर विमानों के आमने-सामने होने की स्थिति में उन्हें जमीन पर उतारना मुश्किल होता है। रोनाल्ड रीगन एयरपोर्ट अमेरिका का सबसे व्यस्ततम एयरपोर्ट है। फिलहाल जांच की जा रही है कि हादसा तकनीकी खामी की वजह से हुआ या किसी अन्य चूक की वजह से। -द कन्वर्सेशन से

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