लोग थिएटर, ओपेरा, काम या फिर यात्रा के लिए किसी खास तरीके से तैयार नहीं होते। कभी-कभी तो हवाई अड्डे पर लोग ऐसे लगते हैं, मानो वे स्लीपओवर पार्टियों में आए हों। औपचारिकता की कमी या फिर विशेष अवसर पर कपड़े पहनने का चलन बेबी बूमर पीढ़ी (द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद 1946 से 1964 के बीच पैदा हुए लोग) में ही दिखने लग गया था। मुझे लगता है कि इसे एक बहुत बड़े और अधिक महत्वपूर्ण सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाव की अभिव्यक्ति के रूप में देखा जाना चाहिए। यह ऐसा बदलाव है, जो परंपरा पर व्यक्ति को तरजीह देता है। नोट्रे डेम यूनिवर्सिटी में इतिहास की एसोसिएट प्रोफेसर लिंडा प्रेजीबीजवेस्की ने द लॉस्ट आर्ट ऑफ ड्रेस नामक विषय पर पूरी किताब लिखी है। वह बताती हैं कि 1960 के दशक में नई पीढ़ी ने परंपरागत पहनावे पर सवाल उठाने शुरू कर दिए थे। उन्होंने कहा, इससे पहले क्या पहनना है, इसके नियम वास्तव में गृह अर्थशास्त्र पाठ्यक्रम का हिस्सा थे। पहले लोग सूट-बूट और टोपी पहनकर निकलते थे, बटन और फीते भी सही होते थे।
प्रेजीबीजवेस्की को 1950 में अमेरिकी कृषि विभाग द्वारा प्रकाशित एक पत्रिका ‘हाउ टू बाय शूज’ मिली थी। उस वक्त सरकार सार्वजनिक पहनावे को भी निर्धारित करती थी। 60 के दशक में युद्ध के विरोध में प्रदर्शन हुए, जिनमें फैशन का विरोध भी शामिल था। प्रेजीबीजवेस्की कहती हैं कि लॉकडाउन के बाद तो पहनावे की औपचारिकताएं बिल्कुल कम हो गईं। विडंबना तो यह है कि शादी-समारोह, जिनमें विशेष रूप से सज-धजकर जाने का रिवाज रहा है, वहां भी लोग औपचारिकता दिखाने से बच रहे हैं। हालांकि, इतिहास खुद को दोहराता है। मुमकिन है कि वर्तमान पीढ़ी एक बार फिर से घर से बाहर निकलते वक्त औपचारिक कपड़े पहनने के महत्व को समझे। लेकिन जब भी ऐसा होगा, तो यह उनके निर्णय से होगा, न कि पहले से चली आ रही परिपाटी की वजह से, जो एक अच्छी बात है। ©The New York Times 2025