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सामाजिक सुरक्षा का सवाल: देश के 90 फीसदी अनौपचारिक श्रमिकों में से गिग श्रमिकों को क्यों अलग कर रही सरकार

संतोष मेहरोत्रा
Updated Mon, 09 Oct 2023 06:23 AM IST

सार

पीएलएफएस द्वारा श्रमिकों को तीन प्रकार से परिभाषित किया गया है-स्व-रोजगार वाले, नियमित वेतन वाले और दैनिक वेतन वाले। नियमित वेतनभोगी श्रमिकों का एक छोटा हिस्सा सामाजिक सुरक्षा का लाभ पाता है; जबकि अधिकांश स्व-रोजगार, आकस्मिक वेतन पाने वाले और नियमित कर्मचारियों को यह सुविधा नहीं है। कोविड और डिजिटल प्रगति ने एक नए शब्द को जन्म दिया है-गिग वर्कर। ये न कर्मचारी हैं, न नियोक्ता। इन्हें इनके द्वारा प्रदान की गई सेवाओं के आधार पर भुगतान किया जाता है।
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सांकेतिक - फोटो : PTI


पीएलएफएस द्वारा श्रमिकों को तीन प्रकार से परिभाषित किया गया है-स्व-रोजगार वाले, नियमित वेतन वाले और दैनिक वेतन वाले। नियमित वेतनभोगी श्रमिकों का एक छोटा हिस्सा सामाजिक सुरक्षा का लाभ पाता है; जबकि अधिकांश स्व-रोजगार, आकस्मिक वेतन पाने वाले और नियमित कर्मचारियों को यह सुविधा नहीं है। कोविड और डिजिटल प्रगति ने एक नए शब्द को जन्म दिया है-गिग वर्कर। ये न कर्मचारी हैं, न नियोक्ता। इन्हें इनके द्वारा प्रदान की गई सेवाओं के आधार पर भुगतान किया जाता है। ये काम करने के लिए बाध्य नहीं हैं, न उन्हें सामाजिक सुरक्षा प्राप्त है। ये फ्रीलांसर होते हैं, जो प्रति घंटे या अस्थायी काम में संलग्न होते हैं। भारत सहित विकासशील देशों में स्व-रोजगार में कार्यरत श्रमिकों की संख्या लगभग आधी है; शेष आधे में से एक-एक चौथाई आकस्मिक और नियमित वेतनभोगी कर्मचारी हैं। प्लेटफॉर्म कर्मचारी गिग श्रमिकों का एक उप-समूह है, क्योंकि ग्राहकों से जुड़ने के लिए ऐप या वेबसाइट का उपयोग किया जाता है। प्लेटफॉर्म आधारित गिग वर्कर परिवहन क्षेत्र (सवारी ऐप्स), डिलीवरी सेवा (खाद्य और किराना, कूरियर, ई-बाजार सेवाएं, स्वास्थ्य देखभाल आदि); आईटीईएस (सामग्री निर्माता, मीडिया सेवा प्रदाता, डिजिटल विपणक, यूट्यूब विपणक, वेबसाइट डेवलपर्स, मोबाइल ऐप डेवलपर्स) आतिथ्य सेवाओं (जैसे क्लीनर, हाउसकीपिंग, लॉन्ड्री); पेशेवर सेवाओं (प्लंबर/इलेक्ट्रीशियन/बढ़ई/पेंटर; और जैसे शिक्षक/कोचिंग सेंटर/ऑडिटर परामर्श आदि) और लॉजिस्टिक सेवाओं (लॉजिस्टिक एप्स के माध्यम से) में पाए जाते हैं। अधिकांश प्लेटफॉर्म आधारित गिग कर्मचारी के, जो मुख्य रूप से डिलिवरी एजेंट या ड्राइवर हैं, जीवन में कोई विकास या कौशल नहीं होता है। ये लक्ष्य पूरा करने या अतिरिक्त पैसा कमाने के लिए काम करते हैं।


गिग वर्कर्स के लिए अब तक ज्यादा कुछ नहीं किया गया है, क्योंकि अधिकांश श्रम कानून स्व-रोजगार या आकस्मिक वेतन वाले श्रमिकों पर लागू नहीं होते। देश में पहली बार राजस्थान ने हाल ही में  गिग श्रमिकों के लाभ के लिए एक प्लेटफॉर्म आधारित कल्याण बोर्ड का गठन करने के लिए कानून बनाया है। पर इसमें अनौपचारिक कार्यबल के विशाल बहुमत को शामिल नहीं किया गया है, जो पारंपरिक स्व-रोजगार, आकस्मिक वेतन श्रमिक और अधिकांश नियमित श्रमिक हैं। केंद्र सरकार ने ई-श्रम पोर्टल के माध्यम से देश में असंगठित श्रमिकों का पंजीकरण किया है, जो 28 करोड़ से अधिक पंजीकरण को पार कर गया है। केंद्र सरकार या राज्य स्तर पर उनके लिए कोई सामाजिक सुरक्षा नीति नहीं है, हालांकि संसद द्वारा पारित सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 (नियमों को अधिसूचित नहीं किया गया है, इसलिए यह कानून नहीं है) गिग श्रमिकों सहित असंगठित श्रमिकों को लाभ प्रदान करने का वादा करती है। सरकार देश के 90 फीसदी अनौपचारिक श्रमिकों में से गिग श्रमिकों को क्यों अलग कर रही है, यह एक ऐसा प्रश्न है, जिसका उत्तर केवल वही दे सकती है।


यदि देश के 54 करोड़ श्रमिकों में से 91 फीसदी मुख्य सामाजिक बीमा (अर्थात वृद्धावस्था पेंशन, मृत्यु/विकलांगता बीमा, मातृत्व लाभ) से वंचित हैं, तो गिग श्रमिकों के लिए राजस्थान का कानून कोई समाधान नहीं है। देश में दशकों से कई राज्यों में कल्याण बोर्ड और राष्ट्रीय स्तर पर निर्माण और बीड़ी श्रमिकों के लिए अलग से कल्याण बोर्ड बनाकर ऐसे खंडित समाधान आजमाए गए हैं। ये अक्सर मुख्य सामाजिक बीमा की पेशकश नहीं करते हैं। लिहाजा यदि हम अनौपचारिक क्षेत्र की समस्याओं का हल निकालने के बारे में गंभीर हैं, तो सभी अनौपचारिक श्रमिकों के लिए सामाजिक बीमा सुनिश्चित करने के लिए सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 में संशोधन करने की आवश्यकता होगी।

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