लोकसभा चुनाव का हल्ला मचा है। सबसे बड़े लोकतंत्र का उल्लास पर्व मनाया जा रहा है। इस शोरगुल में एक आवाज फीकी पड़ी है। गरीब मजदूरों के हित के लिए उठने वाली वैचारिक आवाज वाले कम्युनिस्ट नेता मैदान से गायब हैं।
कॉमरेड प्रकाश करात, सीताराम येचुरी, एबी वर्धन, सुधाकर रेड्डी और दीपांकर भट्टाचार्य जैसे तमाम दिग्गज मीडिया कवरेज से पूरी तरह दूर हैं। क्या पश्चिम बंगाल से बेदखल होने की वजह से ही वामपंथी आवाज पूरी हिंदी पट्टी में गुमसम हुआ पड़ा है?
वृंदा करात या सुभाषिनी अली के किसी बड़े धरने प्रदर्शन के लिए वामपंथ समर्थक तरस रहे हैं। केजरीवाल से मुकाबला करने की कोई बात नहीं हो रही। मोदी के बढ़ते रथ को थामने की जुगत नहीं बिठाई जा रही। राहुल गांधी के खिलाफ वंशवाद पर चोट करने वाला हथौड़ा नहीं चलाया जा रहा।
इस कठोर सत्य की पड़ताल करनी चाहिए कि कॉमरेडों की चुप्पी की क्या वजह है। कहीं ऐसा तो नहीं कि चुनावी प्रक्रिया के जरिये वामपंथी व्यवस्था कायम करने का आग्रह कमजोर पड़ता जा रहा है? अगर ऐसा है, तो यह शोचनीय है। वैसे में खालिस वामपंथ के नाम पर वही बचेंगे, जो अतिरेक के आग्रही हैं।
अपनी बात मनवाने की जिद में उन्हें हथियारों के इस्तेमाल से कोई गुरेज नहीं। संघर्ष के नाम पर उनके हाथ खून से सने हैं। दरअसल अब वक्त ने करवट बदल ली है। गांधी के देश में इस सोच का कोई मतलब नहीं कि सत्ता बैलेट से नहीं, बुलेट से आती है।
वामपंथ के उग्र और अराजक स्वरूप ने भी स्थिति खराब कर दी है। बातों और किताबों से वामपंथ को जमीन पर उतारने की पहल शिथिल पड़ गई है। वामपंथ के नाम पर बस उग्रवाद नजर आ रहा है। उनकी ही धमक सुनी जा रही है,जो व्यवस्था से बुरी तरह हताश हैं।
बंदूक और बारूद के जोर पर भयभीत प्रशासन को आदिवासियों के गांवों तक पहुंचने नहीं दिया जा रहा। महाराष्ट्र में गढ़चिरौली, छतीसगढ़ में बस्तर, पश्चिम बंगाल में जंगलमहल और ओडिशा व झारखंड के कुछ गांव और जंगल अतिवादी वामपंथियों का बसेरा बने हैं। विकास से दूर बसे इन इलाकों में पोलिंग पार्टी का पहुंचना कठिन है।
पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा में कम्युनिस्टों का शासन रहा है, त्रिपुरा में अब भी है। इन तीनों राज्यों में लोकसभा की कुल 64 सीटें हैं। लोकतांत्रिक इतिहास में वामपंथी दलों की सबसे बड़ी दखल 2004 में हुई थी, जब लोकसभा में उसके साठ सांसद चुनकर पहुंचे थे। जबकि औसतन वाम पार्टियों के 30 से 35 प्रत्याशी ही जीतकर संसद में आते रहे हैं।
2004 के उस प्रदर्शन का श्रेय हरकिशन सिंह सुरजीत, ज्योति बसु और इंद्रजीत गुप्त द्वारा तैयार व्यूह रचना को जाता था। उसके बाद धुर कांग्रेस विरोधी प्रकाश करात के कंधे पर माकपा की जिम्मेदारी आई। उन्होंने सबसे प्रभावशाली काम यूपीए की सरकार से समर्थन वापस लेने का किया। इसी में वह गच्चा खा गए। अमेरिका से परमाणु समझौते पर मनमोहन सरकार तो नहीं गिरी, पर 2009 के चुनाव में वाम मोर्चे का प्रदर्शन बदतर जरूर हो गया।
अब लोकसभा चुनाव के दौरान भी वामपंथी दलों के सुर गुम हैं। यकीन नहीं होता कि ये वही वामपंथी दल हैं, जिन्होंने प्रचंड बहुमत वाली राजीव गांधी की सरकार को आईना दिखाने का काम किया था और 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी।
कांग्रेस को बेदखल कर इन्होंने 1996 में संयुक्त मोर्चा की सरकार बनाई। तब इंद्रजीत गुप्त बड़े उसूल वाले गृह मंत्री बने और साबित कर गए कि कॉमरेडों में भी देश चलाने का शऊर है। एक दशक पहले भी यूपीए की सरकार वामपंथी दलों के सहारे बनी थी। लेकिन अब तस्वीर उलट गई है। फिलहाल तो यह भी नहीं कह सकते कि सोलहवीं लोकसभा में कितने कॉमरेड पहुंच पाएंगे।