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किसानों को क्यों जरूरी है सीधी मदद, सरकार को सोचना पड़ेगा

अशोक गुलाटी
Updated Tue, 14 May 2019 06:40 PM IST
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किसान (प्रतीकात्मक तस्वीर)

भारत आज 1.35 अरब लोगों का देश है। 2017 के संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या अनुमान के मुताबिक, भारत 2024 तक चीन की आबादी को पीछे छोड़ सकता है और 2030 में 1.5 अरब आबादी के साथ दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला राष्ट्र बन सकता है। करीब दो तिहाई भारतीय 35 वर्ष से कम उम्र के हैं। पिछले दो दशकों से भारत की जीडीपी लगभग सात फीसदी सालाना की दर से बढ़ रही है और कम से कम एक दशक और यह गति बरकरार रहने की संभावना है। जनसंख्या वृद्धि धीरे-धीरे घटकर अब 1.1 फीसदी रह गई है और यही रफ्तार जारी रही, तो अगले दशक में भारत में प्रति व्यक्ति आय सालाना छह फीसदी की दर से बढ़ने की संभावना है। नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस (एनएसएसओ) द्वारा कराए गए 2011 के खपत व्यय सर्वेक्षण से पता चला कि एक औसत भारतीय परिवार अपने मासिक खर्च का लगभग 45 फीसदी भोजन पर खर्च करता है, इसका मतलब यह हुआ कि भारत में खाद्य की मांग आने वाले वर्षों में बढ़ने वाली है।



इससे एक बुनियादी सवाल पैदा होता है कि क्या भारत खुद अपने के लिए खाद्य उत्पादन कर सकता है या यह एक बड़ा खाद्य आयातक बनेगा। यह सवाल मौजूं है, क्योंकि भारत में खेती योग्य भूमि सीमित है (शुद्ध बुआई क्षेत्र करीब 14 करोड़ हेक्टेयर) और इसका भूजल स्तर निरंतर घट रहा है, साल में लगभग एक मीटर की दर से भूजल स्तर में गिरावट आ रही है। जलवायु परिवर्तन की भविष्यवाणी बढ़ते तापमान और सूखे की अधिक आवृत्ति और तीव्रता का संकेत देती है।


ऐतिहासिक रूप से भारत के लिए अपनी आबादी का पेट भरना कठिन चुनौती रहा है। लेकिन आज भारत न केवल प्रमुख खाद्यों के उत्पादन में आत्मनिर्भर है, बल्कि निर्यातक भी। वर्ष 2012-13 से 2014-15 के बीच भारत ने 6.3 करोड़ टन अनाज का निर्यात किया और आज भारत चावल का सबसे बड़ा निर्यातक है।


दूध भारत का सबसे बड़ा कृषि उत्पाद है। मूल्य के संदर्भ में इसका उत्पादन (वर्ष 2017-18 में 17.7 करोड़ टन) संयुक्त रूप से चावल और गेहूं से अधिक है। 1970 और 1980 के दशक के दौरान वर्गीज कुरियन के मार्गदर्शन में श्वेत क्रांति हुई। उसके बाद भारत ने कृषि क्षेत्र में कई क्रांतियां कीं-मत्स्य क्षेत्र में नीली क्रांति; मांस, खासकर पॉल्ट्री क्षेत्र में लाल क्रांति; फल एवं सब्जी क्षेत्र में स्वर्णिम क्रांति एवं कपास के क्षेत्र में जीन क्रांति। प्रौद्योगिकी और संस्थानों में नवाचार शुरू करके की गई इन कृषि क्रांतियों ने भारत को कृषि उत्पादन का निर्यातक बना दिया। लेकिन एक चीज जो इस विकासवादी प्रक्रिया में ज्यादा सामने नहीं आई, वह है किसानों के प्रोत्साहन का मुद्दा।


आज जबकि बहुत से मुद्दों को सुलझा लिया गया है, किसानों की आय का मुद्दा वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में भी ज्वलंत है। सत्तारूढ़ भाजपा ने 2019 के चुनावी घोषणा पत्र में 2022-23 तक किसानों की आय दोगुनी करने का वादा किया है। इसने 2018-19 में लगभग 23 प्रमुख फसलों के लिए उच्च न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की घोषणा करके कृषि संकट को दूर करने की कोशिश की, लेकिन बड़े पैमाने पर सरकारी खरीद तंत्र की कमी के कारण अधिकांश फसलों की बाजार कीमत घोषित एमएसपी से 10 से 30 प्रतिशत नीचे रह गई। राजनीतिक असंतोष को देखते हुए भाजपा ने किसानों के खाते में नकद आय हस्तांतरण का वादा किया, जिसकी लागत करीब 87,600 करोड़ रुपये हो सकती है। हालांकि यह किसानों की आय में मात्र पांच फीसदी का योगदान देगा। 2022-23 तक किसानों की आय दोगुनी करने के लिए कृषि विपणन में व्यापक सुधार की आवश्यकता होगी।


भारत की राजनीतिक अर्थव्यवस्था ऐसी रही है कि जब भी घरेलू कीमतें बढ़ी हैं, चाहे वह प्याज हो, गेहूं हो या चावल, तो कृषि उत्पादों के निर्यात को प्रतिबंधित किया गया है। निजी क्षेत्र को बड़ा स्टॉक रखने की अनुमति नहीं है और कभी-कभी अंतर्राज्यीय गतिविधियों को 1955 के आवश्यक वस्तु अधिनियम के जरिये प्रतिबंधित कर दिया जाता है। इसने निवेश की कमी के कारण निजी क्षेत्र द्वारा प्रभावी अखिल भारतीय मूल्य शृंखलाओं के निर्माण की अनुमति नहीं दी। इसके अलावा कृषि उपज और विपणन समिति (एपीएमसी) के माध्यम से कृषि विपणन को प्रतिबंधित किया गया, जो इन बाजारों के माध्यम से ही किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए बाध्य करता है। इन बाजारों में कमीशन एजेंटों द्वारा धांधली होती है, जो मूल्य शृंखला में उपभोक्ताओं से ज्यादा रुपये लेते हैं। इन प्रतिबंधात्मक व्यापार और विपणन नीतियों के परिणामस्वरूप, भारत के किसानों को भारी सब्सिडी मिलने के बावजूद बहुत कम लाभ मिलता है। इनसे स्पष्ट है कि भारत के खाद्य और कृषि नीतियों में उपभोक्ताओं के प्रति काफी पक्षपात किया जाता है, जिसका खामियाजा किसानों को भुगतना पड़ता है।


इन शोध निष्कर्षों का सबक यह है कि भारत अगर अपनी नीतिगत संरचना में सुधार कर सकता है, तो कम से कम किसानों को उपभोक्ताओं के साथ बराबरी का हक सुनिश्चित करना होगा, उसके बाद ही किसानों को बेहतर प्रोत्साहन और लाभ मिल सकता है, वे नई प्रौद्योगिकी अपना सकते हैं, पैदावार बढ़ा सकते हैं और भारत को अधिक प्रतिस्पर्धी बना सकते हैं। ऐसा करने का सबसे अच्छा तरीका मौलिक रूप से ईसीए, एपीएमसी अधिनियम, निर्यात नीति, आदि में सुधार करना होगा। अगर भारत ऐसा कर सकता है, तो वह न केवल अपनी आबादी का पेट भर सकता है, बल्कि निर्यात के लिए अतिरिक्त अनाज भी पैदा कर सकता है। इस लोकसभा चुनाव में मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने भी कृषि विपणन में सुधार के साथ-साथ आबादी के निचले 20 फीसदी हिस्से को प्रत्यक्ष आय सहायता देने का वादा किया है। हालांकि कृषि विपणन सुधार पर भाजपा का रुख स्पष्ट नहीं है, लेकिन उसने भी किसानों को प्रत्यक्ष आय सहायता देने का वादा किया है।
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इस लोकसभा चुनाव के बाद चाहे कोई भी पार्टी सत्ता में आए, एक चीज तो स्पष्ट है कि भारत किसानों को प्रत्यक्ष आय सहायता देने के लिए तैयार है और इससे भारत को कम से कम 2030 तक अपनी आबादी को अच्छी तरह से खिलाने में मदद मिल सकती है।


-लेखक आईसीआरआईईआर में इन्फोसिस चेयर प्रोफेसर और सीएएसआई के प्रतिष्ठित इंटरनेशनल फेलो हैं।

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