हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा कि मंदी से निपटने का आधार 'मेड इन अमेरिका' ही है। उनका मिशन बेरोजगारी की समस्या को हल करना है। इस बयान से संरक्षणवादी उपायों के संकेत को साफ समझा जा सकता है। इन उपायों में चीन और भारत जैसे विकासशील देशों से आयात करने वाली कंपनियों की जगह देश में रोजगार पैदा करने वाली कंपनियों को करों में छूट देना शामिल है, ताकि श्रम बाजार का संरक्षण हो सके।
बेरोजगारी के संदर्भ में उनकी यह चिंता निश्चित रूप से प्रशंसनीय है, लेकिन मौजूदा वक्त में इस बात पर भी ध्यान देना जरूरी है कि गलाकाट प्रतियोगिता के युग में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की उन्नति के लिए विकासशील देशों से होने वाले आयात को एक रणनीतिक माध्यम के रूप में देखा जा सकता है। आर्थिक सुनामी से जूझ रही अमेरिकी कंपनियों के लिए चीन और भारत से सस्ता आयात एक बेलआउट पैकेज साबित हो सकता है और वे तेजी से विकास कर सकती हैं।
उदाहरण के लिए, अमेरिकी कंपनियां भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र से सस्ती सेवाओं के जरिये खुद को स्थापित रखने में सफल हुई हैं। इस तरह इन पर प्रतिबंध का कदम अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदेह हो सकता है। विकासशील देशों से आयात के नकारात्मक प्रभावों संबंधी अमेरिकी चिंता वास्तव में तर्कसंगत नहीं है। अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों में यह बात साबित हो चुकी है। अमेरिका के नेशनल ब्यूरो ऑफ इकोनॉमिक रिसर्च के अर्थशास्त्री रॉबर्ट फींस्ट्रा और गॉर्डन हैनसन ने अमेरिकी विनिर्माण कंपनियों पर विदेशों से श्रम संबंधी घटकों के आयात के प्रभाव का अध्ययन किया और बताया कि इससे अमेरिकी श्रमिकों की वास्तविक मजदूरी में इजाफा हुआ।
दो प्रमुख कारणों से अमेरिकी कंपनियों को विकासशील देशों से आयात जारी रखना चाहिए। पहला यह कि प्रौद्योगिकी प्रगति परंपरागत अमेरिकी उद्योगों को प्रौद्योगिकी-संबंधी उत्पादों के बदलाव के लिए प्रोत्साहित करेगा और भारत जैसे विकासशील देशों की आउटसोर्सिंग सेवाओं की परिचालन लागत में कमी आएगी। फेडरल बैंक के मौद्रिक विस्तार से पूंजीगत उत्पादों के निर्माण को बढ़ावा मिलेगा। अमेरिकी कंपनियों के लिए प्रतिस्पर्द्धी कीमतों के जरिये वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा में खुद को बनाए रखने के लिए यह बेहद जरूरी है। अगर ये कंपनियां आयात नहीं करेंगी, तो ये बाजार में प्रतिस्पर्द्धा से बाहर हो जाएंगी। विकासशील देशों की तुलना में अमेरिका में उत्पादन लागत और श्रम कई गुना ज्यादा महंगा है। आयात के माध्यम से कंपनियां धन बचा सकेंगी और उस बचे हुए धन का इस्तेमाल प्रौद्योगिकी उन्नयन और विस्तार के लिए कर सकेंगी।
आयात जारी रखने का दूसरा कारण यह है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था उपभोग आधारित है। वहां के परिवारों की बचत दर एक प्रतिशत से भी कम है, जबकि विकासशील देशों में यह 30 फीसदी से भी ज्यादा है। उच्च उपभोग और कम बचत की यह प्रवृत्ति आयात को बढ़ावा देती है। दरअसल, रिटेल अमेरिका का सबसे प्रतिस्पर्द्धी क्षेत्र है। वॉलमार्ट इस क्षेत्र की सबसे बड़ी कंपनी है। और यह भी सच है कि वॉलमार्ट की सफलता का प्रमुख कारण विकासशील देशों से आयात की उपलब्धता है। वॉलमार्ट स्थानीय बाजारों में सस्ते सामान का उत्पादन नहीं कर सकती है। अगर वह ऐसा करती है, तो रोजमर्रा की वस्तुओं के लिए अमेरिकी उपभोक्ताओं को ज्यादा रकम अदा करनी पड़ेगी और इस तरह उसका साम्राज्य ढह सकता है।
दरअसल, अमेरिकी नीति-निर्माताओं को वैश्वीकरण की वास्तविकता को स्वीकार करना चाहिए। वे कंपनियों को विकासशील देशों से आयात के लिए प्रतिबंधित नहीं कर सकते। वैश्विक अर्थव्यवस्था लागत लाभ पर निर्भर है। एक समय था, जब अमेरिका अन्य देशों पर खुले और मुक्त व्यापार के लिए दबाव बनाता था। लेकिन आज तसवीर बदल चुकी है। चीन और भारत जैसे विकासशील देश वस्तुओं और सेवाओं के ज्यादा प्रभावी निर्यातक बनकर उभर रहे हैं। तब अमेरिका ने सुर बदल लिया है। फिलहाल, विकासशील देशों से आयात रोकने की जगह अमेरिका को वैश्विक बाजार में अपनी श्रमशक्ति को ज्यादा प्रतिस्पर्द्धी बनाने के बारे में सोचना चाहिए।