हालांकि इन्सानों को ही भावनात्मक आंसू क्यों आते हैं, यह बात वैज्ञानिकों के लिए भी पहेली बनी हुई है। दरअसल, हमारी भावनाएं न्यूरोसाइंटिस्टों द्वारा की गई तुलनाओं से भी ज्यादा जटिल हैं, क्योंकि मस्तिष्क में ऐसा कोई भी विशेष क्षेत्र नहीं होता, जो दुख या क्रोध की भावनाओं के लिए जिम्मेदार हो। आंसू तीन तरह के होते हैं। सामान्यत: हमारे नेत्रों सेे दो तरह के आंसू निकलते हैं, बेसल और रिफ्लेक्स। बेसल आंसू आंखों को नम रखते हैं, जबकि रिफ्लेक्स आंसू उन्हें धूल से बचाने के लिए होते हैं। तीसरे आंसू होते हैं भावनात्मक।
हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में नेत्र विज्ञान के प्रो. डार्लिन डार्ट के अनुसार, तीनों प्रकार के आंसू संरचनात्मक रूप से समान हैं, क्योंकि वे एक समान पदार्थों से बने होते हैं। रिफ्लेक्स और भावनात्मक आंसू ज्यादा तरल पदार्थ छोड़ते हैं और ये हमारी भौंहों के नीचे स्थित आंसुओं की विशेष ग्रंथियों से निकलते हैं। जैसे-प्याज काटने पर या धूल आदि आंखों में जाती है, तो रिफ्लेक्स आंसुओं के साथ आंखों की नसें मस्तिष्क को संकेत देती हैं कि जो कुछ भी उन्हें परेशान कर रहा है, उसे बाहर निकालने के लिए आंसुओं की जरूरत है। वहीं, भावनात्मक आंसुओं के संबंध में वैज्ञानिकों का मानना है कि मस्तिष्क के अन्य हिस्से अश्रु ग्रंथियों को चालू करने के लिए ब्रेनस्टेम कोशिकाओं को सक्रिय करते हैं। संकट के समय जानवर भी विलाप करते हैं, लेकिन वे भावनात्मक आंसू नहीं बहाते। धारणा है कि महिलाएं ज्यादा रोती हैं। लेकिन शैशवावस्था में लड़के और लड़कियां समान रूप से रोते हैं। हजारों लोगों पर किए गए अध्ययन के मुताबिक, आधे लोगों ने माना कि रोने के बाद उन्हें बेहतर महसूस हुआ, जबकि 40 फीसदी को कोई फर्क नहीं पड़ा और दस फीसदी लोगों के रोने का एहसास बदतर था। डॉ. रॉटनबर्ग कहते हैं कि इन्सानों के रोने और भावनात्मक आंसू पर कई शोध चल रहे हैं। जब कोई दुख में है, तो उसके साथ सहानुभूति दिखाकर यदि दो आंसू बहा दें, तो इससे उसे बड़ा सहारा मिलता है।