पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में गंगा को जगह दी थी। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बनारस में अपने चुनाव प्रचार के दौरान गंगा की साफ-सफाई को लेकर बड़ी-बड़ी बातें की थीं, मगर गंगा को प्रदूषण से मुक्ति नहीं मिल सकी। अलबत्ता प्रयाग में कुंभ के दौरान गंगा में मिलने वाली गंदगी को रोकने में कुछ सफलता जरूर मिली थी।
समय-समय पर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड भी इस संबंध में कुछ प्रयास करता दिखाई देता है, लेकिन कटु सत्य यह है कि करोड़ों रुपये खर्च करने और अनेक परियोजनाएं बनाने के बावजूद गंगा को प्रदूषण से मुक्ति दिलाने में अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी है। यह सही है कि गंगा के साथ भारतीय समाज की आस्था जुड़ी हुई है, लेकिन हमें ध्यान रखना होगा कि अंध आस्था अनेक नई समस्याओं को जन्म देती है। अगर गंगा के प्रति भारतीय समाज की आस्था सच्ची होती, तो न गंगा प्रदूषित हुई होती और न ही हमें गंगा की स्वच्छता के लिए सरकारी नीतियों के भरोसे रहना पड़ता।