फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

क्यों उड़ गई सोने की चमक

Mon, 15 Apr 2013 09:03 PM IST
मधुरेंद्र सिन्हा
विज्ञापन
विज्ञापन
अस्सी के दशक में सोने-चांदी के दाम आकाश में चढ़कर जब धड़ाम हुए थे, तब सारी दुनिया में जैसे कि भूचाल आ गया था। हजारों सर्राफा व्यापारियों का दीवाला पिट गया और सोने-चांदी का धंधा चौपट हो गया। यह इसलिए हुआ कि इन बहुमूल्य धातुओं खासकर चांदी में विदेशी सटोरियों ने जमकर खेल खेला था और जब वे भागे, तो सोने-चांदी के दाम इतने गिर गए कि कारोबारियों की हालत पतली हो गई।
विज्ञापन


एक दशक तक ऊपर चढ़ने के बाद अब सोने के दाम इतनी तेजी से गिरते जा रहे हैं कि लग रहा है कि उस समय की पुनरावृत्ति न हो जाए। ऐसा नहीं कि यह स्थिति अचानक आई है, काफी समय से इसकी आशंका जताई जा रही थी, क्योंकि सोने में पागलपन की हद तक निवेश हो रहा था। दरअसल यूरोप के आर्थिक संकट और अमेरिकी डॉलर के बेहद कमजोर पड़ने के बाद लोगों ने सोने को सुरक्षित निवेश मान लिया।

ऐसी हालत में अंतरराष्ट्रीय सटोरियों ने भी जमकर पैसा लगाया और फिर इसके पक्ष में एक हवा चल पड़ी। यह देखे बगैर कि सोने का गहने बनाने के अलावा कोई उपयोग नहीं है, लोगों ने सोने में पैसा लगाना शुरू किया और अरबों डॉलर इसमें झोंक दिए गए। इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडेड फंड (ईटीएफ) के अस्तित्व में आने के बाद से तो सोने की खरीद-बिक्री ऑनलाइन हो गई, जिससे इसे खरीदना बेहद आसान हो गया। इसका नतीजा हुआ कि भारत सहित अन्य देशों में सोने की जबर्दस्त खरीदारी होने लगी। भारत सोने का सबसे बड़ा आयातक देश है और यहां सोने की खरीद सबसे अधिक होती है, इतनी ज्यादा कि इसका व्यापार संतुलन ही गड़बड़ा गया।
विज्ञापन


वर्ष 2008 के शुरू में जहां सोने की कीमत 10,500 रुपए प्रति दस ग्राम थी, वहीं यह 2012 में बढ़कर 32,500 रुपए तक चली गई थी। यानी साढ़े चार वर्षों में तीन गुनी बढ़ोतरी!  ऐसा तो कभी देखा-सुना नहीं गया था। लेकिन, 'जो ऊपर जाता है, नीचे भी आता है' के सिद्धांत का पालन करते हुए अब सोने ने नीचे आना शुरू कर दिया है और पिछले शुक्रवार को इसमें रिकॉर्ड गिरावट दर्ज हुई। यह इसलिए हुआ कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में यह बात फैल गई कि अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए साइप्रस का केंद्रीय बैंक 50 करोड़ डॉलर का सोना बेचेगा।

यह खबर अंतरराष्ट्रीय सटोरियों को जैसे ही लगी, उन्होंने धड़ाधड़ अपना स्टॉक निकालना शुरू कर दिया। नतीजतन एक हफ्ते में सोने के दाम अंतरराष्ट्रीय बाजार में लगभग 100 डॉलर तक जा गिरे। सोने का उठाव तो ठंडा पड़ ही गया है और वायदा बाजारों में भी तोते उड़ रहे हैं। इसका असर भारत पर भी पड़ा और सोने के भाव 2011 के स्तर पर जा पहुंचे हैं। अब इसके और गिरने की भी बात कही जा रही है। कई विशेषज्ञ मान रहे हैं कि सोने के दाम इस साल तो गिरेंगे ही, अगले साल भी इसके दाम गिरते रहेंगे।

आखिर ऐसा क्या हुआ कि यह पीली धातु, जिसने अगस्त, 1999 से अगस्त, 2011 तक 650 प्रतिशत का लाभ दिया था, अब बड़े निवेशकों के दिलों से दूर हो रही है? दरअसल बुरे समय के साथी के रूप में देखा जाना ही अब इसके विरुद्ध जा रहा है। अमेरिकी शेयर बाजारों के छलांग लगाने तथा वहां सरकारी बांडों में बेहतर रिटर्न देने की संभावना से सोने के दाम गिर गए। अमेरिकी अर्थव्यवस्था के बारे में माना जा रहा है कि इसके सबसे बुरे दिन खत्म हो गए हैं और यह पुरानी रंगत पर आ रही है।

यदि अर्थव्यवस्था में बेहतरी होती है, तो निवेश के तमाम रास्ते खुल जाते हैं और तब सोना ही पैसे कमाने का एकमात्र विकल्प नहीं रह जाता है। जब भी शेयर बाजारों में बड़ी तेजी आती है, सोने के विदेशी निवेशक और बड़े सटोरिये उससे दूर होने लगते हैं, क्योंकि उनके लिए यह महज निवेश का साधन है। वैसे भी अब बड़े अंतरराष्ट्रीय संकटों की वजह से भी, जैसे सीरिया की अंतर्कलह या फिर कोरिया युद्ध की आशंका से, सोने के दाम नहीं बढ़ रहे हैं।

अगर साइप्रस की तरह अन्य संकटग्रस्त यूरोपीय देशों ने रिजर्व सोना बेचने का ऐलान किया, तो सोने के भाव धूल चाट जाएंगे। सभी देशों के केंद्रीय बैंक सुरक्षा के लिए सोना रिजर्व के रूप में रखते हैं और वक्त के हिसाब से उसमें बदलाव करते हैं। जब वे ऐसा करते हैं, तो सारी दुनिया के सर्राफा बाजार हिल जाते हैं, क्योंकि वे बड़ी मात्रा में सोने की खरीद या बिक्री करते हैं।

लेकिन सोने के चाहने वाले तर्क दे रहे हैं कि यह घटना अल्पकालिक है और सोना उन बुलंदियों को जरूर छुएगा, जहां तक वह पहुंचा था। सोने के पचास साल का इतिहास इस बात का गवाह है कि इसने अपने निवेशकों को अच्छा रिटर्न दिया है। इसके चाहने वालों की कोई कमी नहीं है और इनमें ऐसे निवेशक भी हैं, जो दीर्घकालिक निवेश करते हैं। सोने में इतनी बड़ी गिरावट उनके लिए एक सुनहरा मौका है।

लेकिन सोने की गिरती कीमतें हमारे देश के लिए शुभ हैं। इस समय भारतीय अर्थव्यवस्था चालू खाते के घाटे से बेहाल है, यानी बढ़ते हुए आयात और कम होते हुए निर्यात से वह चरमरा गई है। और इसके लिए कच्चे तेल के साथ-साथ सोना भी उतना ही जिम्मेदार है। इसके बढ़ते दामों से आयात बिल पर भारी दबाव पड़ा है और सरकार को इसके आयात पर अंकुश लगाने के बारे में सोचना पड़ा है। उसके तहत ही इस पर छह प्रतिशत का आयात शुल्क लगा दिया गया है। अब वित्त मंत्री के सिर से एक बड़ा भार स्वतः उतरता जा रहा है।

सोने के दाम में इस गिरावट के बाद अब आम निवेशक क्या करे? क्या उसे सोने में निवेश करना चाहिए? इन सवालों का जवाब फिलहाल मुश्किल है, लेकिन इतना तो जरूर है कि सोने की माया ऐसी है कि आम हिंदुस्तानी बच नहीं सकता है, जिसे अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियां निभानी होती हैं। जाहिर है, उसे सही वक्त का इंतजार करना चाहिए।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें