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ई मेल क्यों, आपस में बात ही कर लें

Sun, 10 May 2015 03:31 PM IST
हेमेन्द्र मिश्र
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वर्ष 2011 में फ्रेंच कंपनी एटोस अचानक ही सुर्खियों में आ गई। इसकी वजह थी, 'शून्य ई मेल' की उसकी पहल। इस प्रयास के तहत कंपनी ने अगले तीन वर्षों में आंतरिक मेल पर पूरी तरह लगाम लगाने का लक्ष्य रखा था। उसने ऐसा इसलिए किया, क्योंकि अत्यधिक ई मेल भेजने और प्राप्त करने की वजह से कर्मचारियों की कार्यक्षमता प्रभावित हो रही थी।
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तब कंपनी के प्रयास को आलोचकों ने 'काल्पनिक लक्ष्य' और 'गैरजरूरी पहल' तक बताया था। पर अब ब्रिटिश विशेषज्ञों ने भी कहा है कि 'महामारी बनता ई मेल' देश की औद्योगिक उत्पादन क्षमता को प्रभावित कर रहा है। आलम यह है कि जी-7 (शीर्ष औद्योगिक देशों का संगठन) के सदस्य देशों की उत्पादकता दर की हालिया सूची में ब्रिटेन का स्थान नीचे से दूसरा है।

हालांकि इसकी एकमात्र वजह ई मेल नहीं है, लेकिन इसे एक महत्वपूर्ण कारण जरूर माना जा रहा है। इसलिए वहां ई मेल को लेकर 'लक्ष्मण रेखा' खींचने की मांग हो रही है। वैसे एक ई मेल गंतव्य तक पहुंचने से पहले जिस तरह सर्वरों से गुजरता है, उसमें खर्च होने वाली ऊर्जा के उत्पादन में चार ग्राम के बराबर कार्बन डाई-ऑक्साइड का उत्सर्जन भी होता है। अगर उसके साथ फोटो या फाइल अटैच की जाए, तो खपत बढ़ जाती है। सच यह भी है कि गूगल पर एक बार 'सर्च' पर क्लिक करते ही हम 60 वाट के बल्ब 17 सेकंड तक जलाने लायक बिजली 'बेजा' कर डालते हैं। लिहाजा ई मेल को लेकर संवेदनशील होने की जरूरत है।
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जैसा कि एटोस ने किया है- छोटी-छोटी बातों के लिए ई मेल करने जैसी 'परंपरा' को तोड़ते हुए कर्मचारियों को मुलाकात कर अपनी बात रखने जैसी पहल सभी देशों में होनी चाहिए। सोशल मीडिया भी इसमें बखूबी साथ निभा सकता है। फॉक्सवैगन (कार बनाने वाली जर्मन कंपनी) जैसी कंपनियां तो इस दिशा में आगे बढ़ भी गई हैं। आज पूरी दुनिया में रोजाना करीब 200 अरब ई मेल (अनुमानतः) का आदान-प्रदान हो रहा है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि इससे कितना कार्बन उत्सर्जन हो रहा होगा।

अगर दस फीसदी ई मेल भी कम हो जाए, तो करीब एक टन कार्बन का उत्सर्जन रोका जा सकता है। मगर इसके लिए जरूरी है कि ऑफिस में 'मेल-मिलाप संस्कृति' को बढ़ावा मिले।
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