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अमेरिका को क्यों नहीं सुहाता भारत-रूस संबंध : यह परमाणु पनडुब्बी 2025 में नौसेना में शामिल हो जाएगी

योगेश जोशी Published by: Raman Singh Updated Fri, 05 Jul 2019 01:13 AM IST
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पुतिन-मोदी - फोटो : a

मार्च, 2019 में भारत ने अकुला वर्ग की परमाणु पनडुब्बी (एसएसएन) पट्टे पर लेने के लिए रूस के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किया। यह परमाणु पनडुब्बी 2025 में भारतीय नौसेना में शामिल हो जाएगी। इससे पहले भारत ने 2012 में मॉस्को से अकुला वर्ग की परमाणु पनडुब्बी एसएसबीएन पट्टे पर ली थी। भारतीय बेड़े में चक्र के नाम से यह पनडुब्बी संभवतः 2025 तक भारतीय नौसेना में नई अकुला पनडुब्बी के चालू होने तक सेवा में रहेगी।

इस समझौते के बाद मॉस्को के साथ नई दिल्ली के रक्षा संबंधों को लेकर वाशिंगटन ने गंभीर चिंता व्यक्त की है। शीतयुद्ध के दौरान भारत और अमेरिका के रिश्ते अच्छे नहीं रहे, लेकिन पिछले पच्चीस वर्षों में दोनों देशों के रिश्ते काफी मजबूत हुए हैं। वाशिंगटन ने भारत के रक्षा बाजार में महत्वपूर्ण पैठ बनाई है, जो कभी रूसी रक्षा उद्योग के लिए ही विशिष्ट रूप से संरक्षित था। बाजार की प्रतिस्पर्धा के बावजूद वाशिंगटन और मॉस्को के बीच बढ़ते तनाव ने नई दिल्ली को हाशिये पर डाल दिया है।



एक तरफ जहां वाशिंगटन ने प्रतिबंधों के माध्यम से रूस को दंडित करने का प्रयास किया है, वहीं मॉस्को के साथ भारत के रक्षा सौदे उसके लिए असहनीय हो गए हैं। अलबत्ता अमेरिका की नाराजगी भारत के निर्णय लेने की प्रक्रिया को मामूली रूप से ही प्रभावित करेगी।

वर्ष 1966 की शुरुआत में भारत के परमाणु ऊर्जा प्रतिष्ठान ने नौसैनिक परमाणु प्रक्षेपण से संबंधित एक संभाव्यता कार्यक्रम शुरू किया। होमी भाभा ने इस अपेक्षा के साथ इसकी शुरुआत की कि अमेरिकी परमाणु ऊर्जा आयोग समुद्री प्रक्षेपण को विकसित करने के लिए भारत की सहायता करेगा। भाभा के अनुरोध को हालांकि तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉनसन के विज्ञान और प्रौद्योगिकी कार्यालय ने मुख्य रूप से दूसरे देशों के साथ नौसेना रिएक्टर प्रौद्योगिकी साझा न करने की एडमिरल रिकोवर की नीति के कारण अस्वीकार कर दिया था।

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पुतिन-मोदी - फोटो : a
मार्च, 2019 में भारत ने अकुला वर्ग की परमाणु पनडुब्बी (एसएसएन) पट्टे पर लेने के लिए रूस के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किया। यह परमाणु पनडुब्बी 2025 में भारतीय नौसेना में शामिल हो जाएगी। इससे पहले भारत ने 2012 में मॉस्को से अकुला वर्ग की परमाणु पनडुब्बी एसएसबीएन पट्टे पर ली थी। भारतीय बेड़े में चक्र के नाम से यह पनडुब्बी संभवतः 2025 तक भारतीय नौसेना में नई अकुला पनडुब्बी के चालू होने तक सेवा में रहेगी।

इस समझौते के बाद मॉस्को के साथ नई दिल्ली के रक्षा संबंधों को लेकर वाशिंगटन ने गंभीर चिंता व्यक्त की है। शीतयुद्ध के दौरान भारत और अमेरिका के रिश्ते अच्छे नहीं रहे, लेकिन पिछले पच्चीस वर्षों में दोनों देशों के रिश्ते काफी मजबूत हुए हैं। वाशिंगटन ने भारत के रक्षा बाजार में महत्वपूर्ण पैठ बनाई है, जो कभी रूसी रक्षा उद्योग के लिए ही विशिष्ट रूप से संरक्षित था। बाजार की प्रतिस्पर्धा के बावजूद वाशिंगटन और मॉस्को के बीच बढ़ते तनाव ने नई दिल्ली को हाशिये पर डाल दिया है।

एक तरफ जहां वाशिंगटन ने प्रतिबंधों के माध्यम से रूस को दंडित करने का प्रयास किया है, वहीं मॉस्को के साथ भारत के रक्षा सौदे उसके लिए असहनीय हो गए हैं। अलबत्ता अमेरिका की नाराजगी भारत के निर्णय लेने की प्रक्रिया को मामूली रूप से ही प्रभावित करेगी।

वर्ष 1966 की शुरुआत में भारत के परमाणु ऊर्जा प्रतिष्ठान ने नौसैनिक परमाणु प्रक्षेपण से संबंधित एक संभाव्यता कार्यक्रम शुरू किया। होमी भाभा ने इस अपेक्षा के साथ इसकी शुरुआत की कि अमेरिकी परमाणु ऊर्जा आयोग समुद्री प्रक्षेपण को विकसित करने के लिए भारत की सहायता करेगा। भाभा के अनुरोध को हालांकि तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉनसन के विज्ञान और प्रौद्योगिकी कार्यालय ने मुख्य रूप से दूसरे देशों के साथ नौसेना रिएक्टर प्रौद्योगिकी साझा न करने की एडमिरल रिकोवर की नीति के कारण अस्वीकार कर दिया था।
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