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जानना जरूरी है: रावण को हराने वाले शक्तिशाली कार्तवीर्य अर्जुन आखिर परशुराम से कैसे हारे, युद्ध की वजह क्या?

सार

Why Parashurama Defeat Kartavirya Arjuna?: कार्तवीर्य अर्जुन को पुराणों में सबसे शक्तिशाली राजाओं में गिना जाता है। उन्हें भगवान दत्तात्रेय से ऐसे वरदान मिले थे, जिनके कारण वह अपराजेय माने जाते थे। लेकिन महर्षि जमदग्नि की हत्या के बाद परशुराम ने उनके खिलाफ युद्ध छेड़ दिया और उनका अंत कर दिया। दोनों के बीच यह युद्ध क्यों हुआ और सहस्रबाहु अर्जुन जैसे राजा की हार कैसे हुई?
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अर्जुन और परशुराम का युद्ध क्यों हुआ? - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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पुराणों में कार्तवीर्य अर्जुन, जिन्हें सहस्रबाहु अर्जुन भी कहा जाता है, सबसे शक्तिशाली राजाओं में गिने जाते हैं। कहा जाता है कि युद्ध के समय उनके शरीर में एक हजार भुजाएं प्रकट हो जाती थीं और उन्होंने पूरी पृथ्वी पर अपना प्रभाव स्थापित किया था। लेकिन इतने शक्तिशाली सम्राट का अंत महर्षि जमदग्नि की हत्या के बाद भगवान परशुराम के हाथों हुआ। यह प्रसंग बताता है कि शक्ति और वैभव के बावजूद अधर्म का परिणाम अंततः विनाश ही होता है।
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कार्तवीर्य अर्जुन राजा यदु के वंश में कृतवीर्य के पुत्र थे। युवावस्था में उन्होंने संपूर्ण पृथ्वी पर धर्म की स्थापना का संकल्प लिया और भगवान दत्तात्रेय को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की। तप से प्रसन्न होकर दत्तात्रेय ने उन्हें चार वरदान दिए। पहला, युद्ध के समय एक हजार भुजाएं प्रकट हों। दूसरा, यदि कभी वह अधर्म के मार्ग पर जाएं तो साधु-संत उन्हें सही रास्ता दिखाएं। तीसरा, पूरी पृथ्वी पर विजय प्राप्त कर धर्मपूर्वक शासन करने की शक्ति मिले। चौथा, उनकी मृत्यु केवल उनसे अधिक शक्तिशाली वीर के हाथों हो।

कार्तवीर्य अर्जुन को इतना शक्तिशाली राजा क्यों माना गया?

वरदान मिलने के बाद कार्तवीर्य अर्जुन ने सातों द्वीपों, समुद्रों और अनेक राज्यों पर विजय प्राप्त कर चक्रवर्ती सम्राट के रूप में पहचान बनाई। उनके शासन में प्रजा सुखी बताई गई है। उन्होंने सात सौ भव्य यज्ञ किए, जिनमें देवता और गंधर्व भी उपस्थित होते थे। देवर्षि नारद ने उनके यज्ञ, दान, तप, पराक्रम और शास्त्र ज्ञान की प्रशंसा की थी। कहा जाता है कि योगबल के कारण वह एक साथ कई स्थानों पर पहुंचकर प्रजा की रक्षा करते थे। वह खेतों और यज्ञों की सुरक्षा करते थे तथा आवश्यकता पड़ने पर वर्षा भी कराते थे।

उनके पराक्रम और महर्षि वसिष्ठ के शाप की कहानी क्या है?

कार्तवीर्य अर्जुन का पराक्रम केवल धरती तक सीमित नहीं था। उन्होंने कर्कोटक नाग के पुत्रों को पराजित कर माहिष्मती में बसाया। नर्मदा नदी की धारा को अपनी सहस्र भुजाओं से रोक दिया। समुद्र में उतरकर इतनी तेज लहरें उठाईं कि बड़े-बड़े जलचर और पाताल के दैत्य भी भयभीत हो गए। एक बार उन्होंने लंकापति रावण को युद्ध में हराकर धनुष की प्रत्यंचा से बांध लिया था। बाद में महर्षि पुलस्त्य के अनुरोध पर उन्हें मुक्त किया। एक अन्य प्रसंग में अग्निदेव को अपना राज्य दान देने के बाद वन जलने लगे और उसी आग में महर्षि वसिष्ठ का आश्रम भी नष्ट हो गया। इससे क्रोधित होकर महर्षि वसिष्ठ ने शाप दिया कि उनका अंत भृगुवंशी परशुराम के हाथों होगा।

महर्षि जमदग्नि की हत्या के बाद परशुराम ने क्या किया?

कहा जाता है कि कार्तवीर्य अर्जुन के सैनिक अहंकार में महर्षि जमदग्नि के आश्रम पहुंचे और उनकी हत्या कर दी। इस घटना के बाद भगवान परशुराम ने कार्तवीर्य अर्जुन को युद्ध की चुनौती दी। भीषण युद्ध में परशुराम ने अपनी दिव्य शक्ति से कार्तवीर्य अर्जुन की एक-एक करके सभी सहस्र भुजाएं काट डालीं और अंत में उनका वध कर दिया। इस तरह भगवान दत्तात्रेय का दिया हुआ वरदान भी पूरा हुआ, क्योंकि उनकी मृत्यु उनसे अधिक शक्तिशाली योद्धा के हाथों हुई।

कार्तवीर्य अर्जुन के बाद उनके वंश का क्या हुआ?

कार्तवीर्य अर्जुन के एक हजार पुत्र बताए जाते हैं। इनमें जयध्वज, शूरसेन, वृषभ, मधु और ऊर्जित प्रमुख थे। पिता की मृत्यु के बाद इन्हीं पुत्रों ने हैहय वंश की परंपरा को आगे बढ़ाया। हालांकि उनका साम्राज्य पहले जैसा शक्तिशाली नहीं रहा, लेकिन हैहय वंश का उल्लेख लंबे समय तक भारतीय इतिहास और पुराणों में मिलता रहा।
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