गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्र को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने जनता की आकांक्षाएं पूरी करने में व्यवस्था की विफलता पर जताई जा रही चिंता को स्वर दिया। उन्होंने कहा कि अगर भारत को एक स्थिर सरकार नहीं मिली, तो राष्ट्र को फिर से खुशहाली के रास्ते पर ले जाने का मौका नहीं आएगा।
उनके मुताबिक, एक बंटी हुई सरकार मनमानी करने वाले अवसरवादियों के हाथों बंधक होती है और 2014 में ऐसी सरकार सर्वनाशी साबित हो सकती है। उनका यह भी कहना था कि अगले चुनाव में कौन जीतता है, यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना यह, कि जो भी जीते, उसकी स्थिरता, ईमानदारी तथा भारत के विकास के प्रति पूर्ण प्रतिबद्धता होनी चाहिए।
राष्ट्रपति ने इस ओर इशारा किया कि गठबंधन तरह-तरह के दबावों का, और इसीलिए अस्थिरता का शिकार हो सकता है। लेकिन भारत की सत्ता राजनीति में गठबंधन सरकारें तो जैसे नियम ही बन गई हैं। अक्सर बड़ी संख्या में पार्टियों तथा उम्मीदवारों के चुनाव में उतरने से कुछ लोग नतीजा निकालते हैं कि यह भारतीय जनतंत्र के छिन्न-भिन्न होने का सुबूत है।
इसके उलट बड़ी संख्या में क्षेत्रीय पार्टियों तथा विभिन्न तबकों के हितों का प्रतिनिधित्व करने वालों की मौजूदगी तो भारत के सामाजिक यथार्थ की भारी विविधता का, हमारी राजनीतिक व्यवस्था में प्रतिबिंबन भर है। इसे भारतीय जनतंत्र के परिपक्व होने की प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि पीछे जाने के रूप में।
बेशक, भारतीय जनतंत्र के परिपक्व होने की इस प्रक्रिया के साथ-साथ कुछ ढांचागत बदलाव करना भी जरूरी है, ताकि इस प्रक्रिया को और समृद्ध बनाया जा सके। जरा एक तथ्य पर गौर करें। 1952 के पहले चुनाव से लेकर अब तक हमारे देश के संसदीय इतिहास में सिर्फ एक बार 50 फीसदी से ज्यादा मतदाताओं के समर्थन के बल पर सरकार चुनी गई है। वह इकलौता चुनाव 1971 का था, जिसमें इंदिरा गांधी ने ‘गरीबी हटाओ’ का नारा दिया था।
केंद्र में आई दूसरी सभी सरकारों के पक्ष में जितने लोगों ने वोट दिया था, उससे ज्यादा लोगों ने उनके खिलाफ वोट दिया था। यहां तक कि राजीव गांधी की सरकार भी इसका अपवाद नहीं थी, जो लोकसभा में सबसे भारी बहुमत से बनी सरकार थी। 1984 के उस चुनाव में 48.1 प्रतिशत वोट के बल पर कांग्रेस को 415 सीटें मिली थीं। जबकि सबसे कम जन समर्थन पर टिकी सरकार 1998 की राजग सरकार थी, जिसके पीछे खड़े गठजोड़ को 36.2 फीसदी वोट ही मिले थे। 2004 के चुनाव में कांग्रेस और भाजपा, दोनों को मिलाकर भी 48.69 फीसदी वोट ही मिले थे।
अगर जनतंत्र वाकई बहुमत का शासन है, तो इस अर्थ में जनतंत्र हमारे यहां अब तक कायम नहीं हो पाया है। इसे देखते हुए आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली को अपनाने पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। इस प्रणाली में पार्टियों द्वारा पहले से घोषित अपनी प्रत्याशी वरीयता सूचियों में से उन्हें मिले मत फीसदी के अनुपात में सदस्य निर्वाचित घोषित किए जाते हैं।
आनुपातिक प्रणाली के आधार पर चुनी गई संसद में बहुमत के समर्थन पर आधारित कोई भी सरकार अनिवार्य रूप से मतदाताओं के बहुमत की इच्छा का प्रतिनिधित्व कर रही होती है। वस्तुतः हमारी संविधान निर्मात्री सभा में इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार भी किया गया था। फिर भी उसने अपने विवेक से, ‘सबसे ज्यादा पावे सो सब ले जावे’, वाली ब्रिटिश प्रणाली को ही चुना। इससे पहले, 1928 में मोतीलाल नेहरू कमेटी की रिपोर्ट में तो बाकायदा सिफारिश की गई थी कि आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली ही भारत की सामाजिक विविधता को प्रतिबिंबित करने के लिए बेहतरीन प्रणाली है।
इस प्रणाली के खिलाफ दलील के रूप में अक्सर इटली में सरकारों की अस्थिरता की मिसाल दी जाती है। पर नहीं भूलना चाहिए कि सब कुछ के बावजूद इटली जी-8 का सदस्य तो बना ही हुआ है। आनुपातिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था चुनाव क्षेत्रों के सामाजिक गठन के हिसाब से उम्मीदवारों का चुनाव करने की मजबूरी और चुनाव में धन तथा बाहुबल की भूमिका को भी बहुत हद तक खत्म कर देगी। फिर भी, इसका समुचित रूप से आकलन करना होगा कि क्या यह व्यवस्था भारत की विविधता का प्रतिनिधित्व कर पाएगी?
भारत की विशाल विविधता के हरेक घटक की स्वाभाविक रूप से यह आकांक्षा होगी कि संसद में उसका प्रतिनिधित्व हो। इसलिए भारतीय संदर्भ में आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली और वर्तमान प्रणाली का योग ही शायद आदर्श साबित होगा। इसे व्यावहारिक बनाने के लिए यह रास्ता अपनाया जा सकता है कि लगते हुए दो चुनाव क्षेत्रों को जोड़ दिया जाए और हरेक मतदाता को दो वोट देने का अधिकार दिया जाए-एक अपनी मर्जी की पार्टी के लिए, और दूसरा, प्रत्यक्ष चुनाव में अपने क्षेत्र के उम्मीदवार के लिए।
ऐसी व्यवस्था का लाभ यह होगा कि एक न्यूनतम मत फीसदी सीमा तय की जा सकेगी, जिससे ज्यादा वोट पाने वाली पार्टी को ही, पूर्व-घोषित वरीयता सूची में, मत प्रतिशत के अनुपात में अपने सदस्य संसद में भेजने का मौका मिलेगा। बेशक, प्रत्यक्ष चुनाव में जीतने वाले उम्मीदवार, इस न्यूनतम मत फीसदी रेखा पार न करने वाली पार्टियों का भी प्रतिनिधित्व करते रह सकते हैं। गठबंधन के इस दौर में, ऐसी व्यवस्था से काफी राहत मिलेगी, क्योंकि इसके जरिये बहुत हद तक अनुचित दबावों व मांगों से या राष्ट्रपति के शब्दों में कहें, तो मनमानी करने वाले अवसरवादियों के हाथों बंधक होकर रहने की मजबूरी से छुट्टी मिल जाएगी।