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चीन क्यों दुनिया को जीत नहीं पाएगा

रामचंद्र गुहा
Updated Sun, 31 May 2020 03:57 AM IST
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india china flag - फोटो : social media

भारतीय 'मिलिट्री अफेन्सिव' यानी 'सैन्य आक्रमण' शब्द को तत्परता से चीन से जोड़कर देखते हैं। चाहे हम 1962 के सीमा युद्ध के बारे में सोचें या फिर लद्दाख की गलवां घाटी की घुसपैठ के बारे में, जिसकी हम अभी चर्चा कर रहे हैं। दूसरी ओर 'चार्म अफेन्सिव' शब्द यानी लुभाने वाले अभियान को हम हमारे ताकतवर कम्युनिस्ट पड़ोसी से नहीं जोड़कर देखते।



इसीलिए हाल ही में भारतीय मीडिया में चीनी विद्वानों और कूटनीतिकों द्वारा दिए गए अनेक साक्षात्कारों को देखकर हैरत हुई। द हिंदू से बात करते हुए एक चीनी विद्वान ने तर्क दिया कि कोरोना वायरस की महामारी का पश्चिमी देशों की तुलना में उनके देश ने कहीं बेहतर ढंग से सामना किया। उन्होंने दावा किया कि चीन ने 80 से अधिक देशों को विभिन्न तरह की चिकित्सा संबंधी मदद पहुंचाई और फिर जोर देकर कहा, 'चीन के प्रति सकारात्मक रुख रखने वाले देशों की संख्या नकारात्मक रुख रखने वालों से कहीं अधिक है।'


इस बीच, भारत में चीनी राजदूत हमारे एक टेलीविजन चैनल में नजर आए और उन्होंने अपने देश का पक्ष जितना संभव हो सका, मजबूती से रखा। उन्होंने कहा, 'चीन भारत को मदद को तैयार है और हम जो संभव हो कर सकते हैं।' उन्होंने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, 'हम महामारी से भारत की जल्द विजय की गंभीरता से कामना करते हैं। हमने चीन में चिकित्सा उपकरणों की खरीद के लिए भारत के वास्ते दरवाजे खोल रखे हैं।'


चिकित्सा संबंधी मदद की विशिष्ट पेशकश के बाद राजदूत ने अब भुला दी गई भावना 'हिंदी-चीनी भाई भाई' को याद किया, जो कि संभवतः 1962 के युद्ध से पहले तक कायम थी। उन्होंने कहा, 'इस वर्ष चीन और भारत के कूटनीतिक संबंध स्थापित होने की सत्तरवीं वर्षगांठ है। हम न केवल पड़ोसी हैं, बल्कि दोस्त और साझीदार भी हैं। दुनिया के दो सर्वाधिक आबादी वाले विकासशील देश के रूप में चीन और भारत को महामारी से लड़ाई में जीत के लिए मिलकर सहयोग करना चाहिए।'


इस बीच, चीनी प्रतिष्ठान ने अमेरिकी प्रतिष्ठान के प्रति भी ऐसी ही उदारता दिखाई है। रिपब्लिकिन संकीर्णतावाद समर्थक वॉल स्ट्रीट जर्नल में अपने एक लेख में एक शीर्ष चीनी राजनयिक ने तर्क दिया है कि उनके देश को पश्चिमी प्रेस में गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया है। उन्होंने दावा किया कि कोरोना से लड़ाई में चीन वास्तव में एक आदर्श है।


राजनयिक ने लिखा, 'इसकी पहली लहर का शिकार होने वाले देशों में चीन ने इसका सामना परीक्षा देने जैसा किया और उसके अच्छे नतीजे से दूसरे देशों को निर्णय लेने में मदद मिली।' उन्होंने वुहान के लोगों की तारीफ की और कहा कि वे जिम्मेदारी, त्याग और एकजुटता का प्रतीक हैं और उन्होंने महामारी से प्रभावी तरीके से लड़ने के लिए दुनिया को प्रेरित किया। राजनयिक ने आगे लिखा, 'चीन जहां अपनी व्यवस्था या मॉडल का निर्यात करने का इरादा नहीं रखता, कोविड-19 से जीवन रक्षक लड़ाई में उसकी क्षमता, भावना और जिम्मेदारी की भावना को रेखांकित किया जाना चाहिए।'


चीनी राज्य की ओर से यह प्रचार अभियान असामान्य है। स्वतंत्र रिपोर्ट्स बताती हैं कि चीनी राज्य चाहे जो कुछ हो, महामारी से निपटने में वह जिम्मेदार, खुला या पारदर्शी नहीं है। उन्होंने 'वेट मार्केट' (ताजा मांस का बाजार) में जंगली जानवरों की तस्करी को मंजूरी देकर उन्हें फिर से खोलने की मंजूरी दी, जबकि इन बाजारों ने अतीत में जो महामारियां फैलाई थीं, वह अपने आप में गैरजिम्मेदाराना आपराधिक कृत्य था। इसके बाद जब अभी महामारी का प्रकोप हुआ, तो चीनी राज्य ने शुरू में ही आगाह करने वाले अपने डॉक्टरों को दंडित किया और कई हफ्तों तक दुनिया से महत्वपूर्ण जानकारियां छिपाए रखी।
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ऐसे में चीनी राजनयिकों और विद्वानों की यह पहल संकेत कर रही है कि वे इस बात को लेकर चिंतित हैं कि महामारी अंतरराष्ट्रीय समुदाय में चीन की छवि को प्रभावित करेगी। अब से कुछ दशक पहले तक चीनी प्रतिष्ठान वैश्विक मामलों में अपनी उभरती हैसियत को हल्के में ले रहा था। शानदार आर्थिक प्रगति और रक्षा तथा प्रौद्योगिकी क्षमता के विकास ने चीन के राजनीतिक नेतृत्व में विश्वास की भावना जगाई है।


अपनी सभ्यता की प्राचीनता पर गर्व हमेशा चीन के चरित्र के केंद्र में रहा है; आर्थिक समृद्धि और सैन्य कौशल की धारा ने उनकी धारणा को मजबूती दी कि दुनिया पर प्रभुत्व और उसे आकार देना उसकी नियति है। वैश्विक महानता के इस पूर्वानुमान का अनेक लेखकों ने समर्थन किया है, जोकि खुद चीनी नहीं हैं। व्यापक रूप से दावा किया गया है कि जिस तरह से 19 वीं सदी ने ग्रेट ब्रिटेन को दुनिया की महान शक्ति के रूप में देखा, बीसवीं सदी ने अमेरिका को इस भूमिका में देखा, 21 वीं सदी में यह जिम्मेदारी पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को हस्तांतरित हो जाएगी।


मौजूदा महामारी से पहले तक मैं खुद ऐसे दावों को लेकर सशंकित था। मैंने सोचा नहीं था कि चीन इतनी आसानी से धरती के सबसे प्रभावशाली राष्ट्र के रूप में ब्रिटेन या अमेरिका की जगह लेगा। ऐसा इसलिए था, क्योंकि अपनी तमाम आर्थिक सफलताओं और सैन्य ताकत के बावजूद चीनी संस्कृति दूर तक भी चीन से बाहर वैसी आकर्षक नहीं होगी, जैसा कि ब्रिटिश संस्कृति कभी ब्रिटेन के बाहर थी या अमेरिकी संस्कृति आज भी अमेरिका से बाहर है।


हार्वर्ड के विद्वान जोसेफ नेई के शब्दों में चीन के पास वैश्विक मामलों में प्रभुत्व जमाने के लिए 'हार्ड पावर' तो है, लेकिन ऐसा करने के लिए उसके पास 'सॉफ्ट पावर' नहीं है। 19 वीं सदी में ब्रिटेन ने जब दुनिया पर फतह की थी, तो वह अपने साथ शेक्सपीयर और डिकंस के काम और क्रिकेट, टेनिस, फुटबॉल और अन्य खेल लेकर भी आया था। 20 वीं सदी में जब अमेरिका ने दुनिया पर फतह की, तो वह अपने साथ हॉलीवुड, जाज, ब्ल्यू जींस और फाकनर तथा हेमिंग्वे (सहित अन्य) के उपन्यास लेकर भी आया।


पक्के तौर पर चीन दुनिया की एक महान सभ्यता होने का अभिमान करता है। हालांकि जिस शख्स माओ त्से तुंग ने कम्युनिस्ट चीन की स्थापना की थी, उसने अतीत की कला, स्थापत्य और साहित्य को बर्बरता पूर्वक अस्वीकार किया और उन्हें जड़ से खत्म करना चाहा। ऐसा करते हुए वह अपने सोवियत समकक्ष से बुनियादी रूप से अलग थे, जिन्होंने सक्रियता के साथ समृद्ध रूसी विरासत को सांस्कृतिक निर्यात का हिस्सा बनाना चाहा। 


1950 और 1960 के दशकों में जब सोवियत संघ वैश्विक दबदबे के लिए अमेरिका के साथ मजबूती के साथ प्रतिस्पर्द्धा कर रहा था, उसने कम्युनिस्ट युग से पूर्व के रूसी रचनाकारों विशेष रूप से महान रूसी उपन्यासकारों को याद किया। जब अंग्रेजों, या अमेरिकियों या फिर रूसियों ने एशिया और अफ्रीका में अपना राजनीतिक प्रभाव बढ़ाना चाहा, तो उन्हें न सिर्फ उनकी आर्थिक और सैन्य ताकत की वजह से, बल्कि वे अपने साथ जो आकर्षक सांस्कृतिक उत्पाद लेकर आ रहे थे, उसके प्रति आकर्षण और प्रेम के कारण भी भय और असुरक्षा का सामना करना पड़ा। उनके खेलों, पुस्तकों, संगीत और उनकी फिल्मों ने दूसरे देशों के लोगों को आकर्षित कर अपने प्रभाव में ले लिया।


अतीत की महाशक्तियों के विशाल सांस्कृतिक योगदानों की तुलना में चीनियों ने दुनिया को अपनी पाक कला दान दी है-और यह किसी भी तरह से उनके डराने-धमकाने के तरीकों से सामंजस्य स्थापित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। दूसरी ओर ब्रिटेन और अमेरिका का वैश्विक प्रभाव बना रह सका, तो इसलिए क्योंकि उनके राजनीतिक प्रभुत्व के साथ सांस्कृतिक आधिपत्य भी जुड़ा हुआ था।


यहां तक कि हम वियतनाम या इराक में अमेरिकी नीतियों का विरोध करते हुए भी जींस पहनते हैं, कोका कोला पीते हैं, रॉक संगीत सुनते हैं और क्लिंट ईस्टवुड और मेरिल स्ट्रीप की फिल्में देखते हैं। हम अमेरिकी संस्कृति की सुंदरता और विविधता की प्रशंसा करते हुए अमेरिकी राज्य को नापसंद कर सकते हैं।


इसकी तुलना में, विदेश में दिलों और विचारों को जीतने के अभियान में सॉफ्ट पावर की सापेक्ष कमी चीन के लिए एक गंभीर नुकसान है। कोविड-19 के बारे में सुनने से पहले यह सब ऐसा ही था। महामारी के खत्म होने के बाद भी ऐसा ही होगा। यदि अभी वे हमारी सीमाओं के आसपास गड़बड़ी नहीं कर रहे होते, तब भी भारतीय कभी दूर से भी चीन को आदर्श के रूप में नहीं देखते कि कैसे वे उसकी तरह व्यवहार करें।


न ही एशिया और अफ्रीका के अन्य हिस्से के लोग। चीनी शायद और अधिक समृद्ध और ताकतवर हो जाएं, मगर चीन कभी दूसरे देशों में उस तरह से दोस्तों और प्रशंसकों को आकर्षित नहीं कर पाएगा, जिस तरह से उसके महान प्रतिद्वंद्वी अमेरिका ने किया है और आगे भी करेगा।

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