हर साल जब बजट बनता है, तब वित्त मंत्री के सामने यह समस्या खड़ी होती है कि वह अपने खजाने को किस-किस मद में कैसे बांटें और राज्यों की चिंता होती है कि मिला हुआ धन कैसे खर्च करें। यह दिलचस्प बात है कि राज्य सरकारें बजट में ज्यादा से ज्यादा धन मिलने की उम्मीद रखती हैं, लेकिन जब खर्च करने की बारी आती है, तब उनमें से ज्यादातर कसौटी पर खरे नहीं उतरते। बड़ी तादाद में मिला हुआ धन धरा रह जाता है।
यह एक विडंबना है, क्योंकि भारत जैसे विकासशील देश में तेजी से विकास के लिए धन की बहुत जरूरत है, लेकिन कई राज्यों की उपेक्षा से यह नहीं हो पाता है। कल्याणकारी योजनाओं में भी पूरे पैसे खर्च नहीं हो पाते हैं, जबकि इस देश की बहुत बड़ी आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन बसर करती है। दरअसल भारत में यह समस्या हमेशा से रही है कि योजनाएं तो बहुत बनती हैं, लेकिन उनका कार्यान्वन सही ढंग से नहीं हो पाता।
अगर हम पिछले कुछ वर्षों के बजट आवंटन को देखें, तो पाएंगे कि कल्याणकारी योजनाओं में सबसे ज्यादा महत्व मनरेगा को दिया जाता रहा है। बेशक उसके राजनीतिक कारण हों, लेकिन सच्चाई यह भी है कि रोजगार पैदा करने में उसकी बड़ी भूमिका रही है। इस योजना के कारण ही देश में मजदूरी बढ़ी है और कई इलाकों में गांवों से किसान-मजदूरों का पलायन रुका है।
पिछले साल वित्त मंत्री ने इस मद में 48,000 करोड़ रुपये की विशाल राशि दी। इसमें से 40,480 करोड़ रुपये राज्यों को आवंटित किए जा चुके हैं। इस साल इसमें कुछ बढ़ोतरी की ही संभावना है। अब अगर हम सभी राज्यों के खर्च के बारे में देखेंगे, तो हैरानी ही होगी। इस साल 31 अक्तूबर तक कई राज्यों ने यह ब्योरा तक नहीं दिया है कि इस मद में कितना खर्च किया है और प्रतिदिन कितनी मजदूरी दी है। इसलिए उनका आगे का आवंटन भी रोक लिया गया था।
पिछले बजट में दो और महत्वपूर्ण ग्रामीण योजनाएं थीं, जिन पर बड़ी राशि आवंटित की गई थी। एक थी ग्रामीण सड़क योजना, जिसमें 19,000 करोड़ रुपये आवंटित हुए थे। इसी तरह प्रधान मंत्री ग्रामीण आवास योजना पर 23,000 करोड़ रुपये की राशि दी गई थी। अब तक यह स्पष्ट नहीं है कि किस राज्य ने इन पर कितना खर्च किया है। पूरी पारदर्शिता इसमें नहीं दिखती है। अगर हर राज्य हर महीने होने वाले खर्च का ब्योरा दे, तो पता करना आसान होगा कि इन मदों में दी जा रही राशि का कितना सदुपयोग हुआ है। कई बार कैग की रिपोर्ट से ही चीजें सामने आती हैं।
केंद्र व राज्य सरकारों के संयुक्त वित्तीय और राजस्व खातों पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2015-16 में असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, पंजाब, सिक्किम तथा उत्तराखंड में पूंजीगत व्यय में गिरावट आई। जबकि छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, त्रिपुरा, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में इस दौरान पूंजीगत खर्च में वृद्धि की दर धीमी रही।
हालांकि अरुणाचल प्रदेश, आंध्र प्रदेश, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, झारखंड, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, नगालैंड और राजस्थान में वित्त वर्ष 2015-16 में पूंजीगत व्यय में वृद्धि दोगुनी हुई है, जबकि सबसे ज्यादा 85.9 प्रतिशत की बढ़ोतरी हरियाणा में हुई है। कैग ने कहा है कि सिर्फ हरियाणा ही ऐसा राज्य रहा, जहां यह धनराशि आर्थिक क्षेत्र के साथ-साथ सामाजिक क्षेत्र पर भी खर्च की है। अन्य राज्य इसमें पिछड़ गए हैं। इस तरह से कई अन्य योजनाओं में भी बजट में दी जाने वाली राशि का पूरा इस्तेमाल नहीं हो पाया है।
रक्षा पर हमारा देश कुल बजट का सबसे बड़ा हिस्सा खर्च करता है। वित्त मंत्री ने 2017-18 के बजट में रक्षा के लिए कुल 3.59 लाख करोड़ रुपये की राशि आवंटित की, जो पहले से ज्यादा तो है, लेकिन देश की रक्षा जरूरतों के लिहाज से कम मानी गई। हालांकि रक्षा बजट का भी यह हाल है कि लगभग हर साल सेना धन लौटा देती है। पिछले दो साल में लगभग 7,000 करोड़ रुपये की राशि लौटा दी गई है।
रिजर्व बैंक की 2016 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य सरकारें केंद्र की तुलना में 30 प्रतिशत ज्यादा खर्च करती हैं। लेकिन उनके बजट आवंटन का 21 प्रतिशत ब्याज चुकाने में चला जाता है। पंजाब और पश्चिम बंगाल तो इसमें बहुत आगे हैं। पंजाब अपनी राजस्व प्राप्ति का 70 प्रतिशत तक ब्याज चुकाने में खर्च करता है, जो विकास की दृष्टि से चिंताजनक है। इसका असर केंद्र से विभिन्न मदों में दी गई राशि पर भी पड़ता है।
बजट में दी गई राशि के सदुपयोग में सबसे बड़ी बाधा वेतन-भत्तों पर खर्च है। पिछले एक दशक में केंद्र और राज्य सरकारों के कर्मचारियों के वेतन-भत्तों में भारी बढ़ोतरी हुई है। इस समय शिक्षा और स्वास्थ्य के मद में दी गई राशि का बड़ा हिस्सा राज्य सरकारें वेतन वगैरह पर खर्च कर रही हैं। इसका असर विकास पर पड़ता है, क्योंकि वह बहुमूल्य राशि किसी उत्पादक कार्य में न लगकर यों ही चली जाती है। इससे न तो उस विभाग को फायदा होता है, जिसके लिए राशि आवंटित हुई है और न ही राज्य को। यह चिंताजनक प्रवृत्ति है और इसका निराकरण होना ही चाहिए।
राज्य सरकारें अगर ऐसा करती रहीं, तो उनके विकास की दर घट जाएगी। इतना ही नहीं, राज्य सरकारें समय-समय पर किसान कर्ज माफी योजना पर भी भारी खर्च करती हैं, जिनसे उनके संसाधनों पर दबाव पड़ जाता है। योगी सरकार ने आते ही चुनावी वायदे के तहत किसानों का कर्ज चुकाने के लिए भारी खर्च किया है, जिसका असर राज्य सरकार की अन्य योजनाओं पर पड़ रहा है।
यह तो राशि खर्च करने की बात हुई, लेकिन उससे भी बड़ा प्रश्न है कि जो पैसा मनरेगा या इस तरह की योजनाओं के माध्यम से केंद्र सरकार राज्यों को भेज रही है, उसका कितना बड़ा हिस्सा किसान-मज़दूरों तक पहुंच पाता है? यही कारण है कि इतनी बड़ी राशि खर्च करने के बाद भी उतना बदलाव नहीं हुआ, जितने की अपेक्षा की गई।