फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

ओपिनियन पोल पर प्रतिबंध क्यों लगे

Thu, 07 Nov 2013 07:24 PM IST
हरबंश दीक्षित
विज्ञापन
विज्ञापन
इस मान्यता का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है कि ओपिनियन पोल के प्रकाशन से मतदाता की सोच पर असर पड़ता है। दूसरे देशों में भी इस पर व्यापक बहस हुई है। ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका, स्वीडन, इंग्लैंड और अमेरिका में चुनाव से जुड़े सर्वेक्षणों के प्रकाशन पर कोई पाबंदी नहीं है। जबकि कनाडा और फ्रांस जैसे देशों में मतदान शुरू होने के चौबीस घंटे पहले तक मतदान सर्वेक्षणों के प्रकाशन पर पाबंदी लगाई गई है।
विज्ञापन


ओपिनियन पोल के प्रकाशन से संबंधित दूसरा प्रश्न अभिव्यक्ति की आजादी का है। संविधान के अनुच्छेद, 19(1) के तहत प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की आजादी का बुनियादी हक मिला हुआ है और उस पर केवल अनुच्छेद 19(2) में वर्णित आधारों पर ही प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, जिसमें कहा गया है कि केवल राष्ट्र की संप्रभुता, एकता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार या सदाचार के हित में या अदालत की अवमानना, मानहानियां या अपराध के उद्दीपन के संबंध में ही युक्तियुक्त प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।

ओपिनियन पोल के प्रकाशन के माध्यम से विचारों की अभिव्यक्ति होती है, शोधपरक विश्लेषणों का प्रकाशन होता है तथा तथ्यपरक सूचनाएं उपलब्ध कराई जाती है। इस प्रक्रिया में मतदाता भी अपने राय की अभिव्यक्ति करते हैं तथा ओपिनियन पोल के परिणामों से उन्हें अपने साथी मतदाताओं की राय का भी पता चलता है। सर्वोच्च न्यायालय ने सूचना पाने के अधिकार को भी अभिव्यक्ति का हिस्सा माना है।
विज्ञापन


ओपिनियन पोल के प्रकाशन के विरोध में दो कारण दिए जा रहे हैं। पहला यह कि इन सर्वेक्षणों के परिणामों से आम मतदाता प्रभावित होकर अपनी राय बदल लेता है, और दूसरा यह कि मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए राजनीतिक दल उन्हें प्रायोजित कर जनता को दिग्भ्रमित करने का प्रयास कर सकते हैं। पहली आशंका का कोई तार्किक आधार नहीं है। तथ्यपरक विश्लेषणों के आधार पर यदि कोई व्यक्ति अपनी राय बनाता है और इसके लिए सूचनाएं एकत्रित करने में यदि चुनाव सर्वेक्षण करने वाले लोग अपनी भूमिका अदा करते हैं, तो उनकी प्रशंसा की जानी चाहिए, क्योंकि वे जनता को शोधपरक सूचनाएं देते हैं। रही बात दूसरे कारण की, तो इस पर जरूर विचार किया जाना चाहिए कि वे कौन-से तरीके हो सकते हैं, जिनसे गलत सूचनाओं के जरिये गुमराह करने वालों के भंवरजाल से जनता को बचाया जा सके।

चुनाव सर्वेक्षणों का प्रकाशन चूंकि अभिव्यक्ति की आजादी का अभिन्न हिस्सा है, इसलिए उन्हें केवल अनुच्छेद 19(2) में वर्णित आधारों पर ही प्रतिबंधित किया जा सकता है। जबकि इनके प्रकाशन से न तो देश की संप्रभुता को खतरा होता है, न राष्ट्र की एकता-अखंडता खतरे में पड़ती है। यह राष्ट्र की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध, लोक व्यवस्था या नैतिकता के हितों के विरुद्ध भी नहीं है। इनके प्रकाशन से यदि अदालतों की अवमानना नहीं होती या अपराधों बढ़ावा नहीं मिलता, तो इन्हें प्रतिबंधित करना संविधान सम्मत नहीं है।

यह सही है कि निष्पक्ष व स्वतंत्र चुनाव भी लोकतंत्र की एक आवश्यक शर्त है। चुनाव प्रक्रिया के दौरान यदि कोई व्यक्ति या संस्था भ्रामक तथ्य देकर चुनाव परिणामों को प्रभावित करना चाहता है, तो अभिव्यक्ति के अधिकार के नाम पर ऐसे दुष्प्रचार को अनुमति नहीं दी जा सकती। इसी तरह मतदाता को तथ्यपरक सूचना पाने का अधिकार है। उसे उस प्रक्रिया के बारे में भी जानने का अधिकार है, जिनके माध्यम से किसी तथ्य तक पहुंचने में मद्द मिली हो। इससे मतदाता को तथ्यों के वस्तुनिष्ठ आकलन में मदद मिलेगी। इसे सुनिश्चित करने के लिए सरकार नियम बना सकती है तथा चुनाव आयोग भी अनुच्छेद-324 में दिए गए अधिकारों के प्रयोग में ऐसा कर सकती है। इसके लिए ऐसे नियम बनाए जाएं कि सर्वेक्षण करने तथा करवाने वाली संस्थाओं का विवरण तथा सर्वेक्षण प्रक्रिया की विस्तृत जानकारी भी दी जाए, ताकि मतदाता उनकी विश्वसनीयता के बारे में भी राय बना सके। इससे अभिव्यक्ति की आजादी का सम्मान होगा तथा मतदाताओं के तथ्यपरक सूचना पाने के अधिकार की भी रक्षा होगी।
विज्ञापन

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें