भाई, यह तो हद है। अब लोगों को यह याद दिलाना भी गुनाह हो गया कि हमारे गरबे में आपका क्या काम है? मध्य प्रदेश में सत्ताधारी पार्टी के विधायक ने बाकायदा पर्चा निकालकर गरबा आयोजकों को पहले ही आगाह कर दिया था कि अपने गरबे में दूसरों को न घुसने दें। वरना दूसरी ओर वाले अच्छे-अच्छे कपड़े पहनकर आएंगे और लव जेहाद कर जाएंगे, जबकि हमारे अपने नौजवान टापते रह जाएंगे, भले ही वे ज्यादा क्यों न चमक रहे हों!
अब तोगड़िया साहब ने बाकायदा परिचय आदि देखकर सिर्फ अपने समुदाय के युवाओं को ही गरबा पंडालों में घुसने देने का रास्ता क्या सुझाया, इस पर हंगामा खड़ा हो गया है। क्यों भाई? कहा जा रहा है कि यह तो भारतीय संस्कृति पर हमला है। एक ही समुदाय वालों का गरबा भी भला कोई गरबा हुआ! पर मिली-जुली संस्कृति की दुहाई ने हमारे यहा बड़ी तबाही मचा रखी है। यह भारतीय संस्कृति के विरुद्ध सेक्यूलरवादियों का षड्यंत्र है। हर चीज में अगर ये ऐसे ही मिलावट कराते रहे, तो वह दिन दूर नहीं, जब हमारी शुद्ध संस्कृति ही लुप्त हो जाएगी। वैसे भी जिस मिलावट को बाकी हर चीज में बुरा माना जाता है, उसे संस्कृति के मामले में ठीक कैसे माना जाए? संस्कृति के मामले में मिलावट अगर फायदेमंद होती भी हो, तो गरबा के मामले में अलग-अलग समुदायों के युवाओं के मेल-जोल की इजाजत तो हर्गिज नहीं दी जा सकती।
सारी गड़बड़ी दरअसल धर्म में संस्कृति की मिलावट की वजह से हुई है। ऐसे में बेचारे तोगड़िया साहब को अब यह याद दिलाना पड़ रहा है कि गरबा नहीं, नवरात्र असली चीज है। गरबा तो इस धार्मिक कर्मकांड का एक हिस्सा भर है। कोई माने या न माने, पर गरबा को नाच-गाने का कार्यक्रम बनाना एक षड्यंत्र है। नाच-गाने का मामला बनाते ही मुंबइया फिल्मों की तरह, अलग-अलग समुदायों के युवाओं के मेल-मिलाप का दरवाजा खुद ब खुद खुल जाता है। अपने युवाओं को इस तरह पथभ्रष्ट होने से बचाना ही होगा। फिर चाहे गरबा रहे या न रहे।