जी, यह किसका लोकपाल है? अन्ना जी का? या फिर सरकार का? अरविंद केजरीवाल जी ने साफ हाथ झाड़ लिए हैं कि जी, हमारा वाला तो है नहीं और अन्ना जी वाला तो बिल्कुल भी नहीं है। वह तो जनलोकपाल था। पर यह तो जोकपाल है। इससे नेता तो क्या चूहा भी जेल नहीं जा पाएगा।
यह जानकर चूहे मस्त हैं। अब वे सरकारी गोदामों का अनाज एकदम टेंशनमुक्त होकर चट कर सकते हैं। लेकिन अन्ना जी कह रहे हैं कि चूहा तो क्या, इससे तो शेर भी जेल जाएगा। इससे शेर बेचारे और डर गए हैं। शिकारियों-तस्करों के चलते जिंदगी तो उनकी पहले ही खतरे में थी, पर अब तो जेल भी जाना पड़ेगा।
वैसे लोग समझ रहे थे कि लोकपाल भ्रष्टाचार मिटाने के लिए है। पर इधर पता चल रहा है जी कि यह तो कोई जेल भेजने वाला कानून भर है। अगर लोकपाल जेल भेजने के लिए ही बनना था, तो उसके लिए तो पहले ही बहुत से कानून थे। बेचारे लालू जी तो बिना लोकपाल के ही कई बार जेल हो आए हैं। राजा जी, कनिमोझी, कलमाड़ी जी भी बिना लोकपाल के जेल हो आए हैं।
सपा वालों ने शायद इसीलिए कहा होगा कि लोकपाल बनाने की कोई जरूरत नहीं है। पता नहीं क्यों, फिर भी चालीस साल से इसकी मांग हो रही थी। अन्ना जी को अनशन करने पड़े। सांसदों को आधी-आधी रात तक माथापच्ची करनी पड़ी। और अब जब यह बन गया है, तब अरविंद जी कह रहे हैं कि यह हमारा वाला नहीं है।
अन्ना जी कह रहे हैं कि यह लोकपाल जिसका भी है, अच्छा है। कम से कम चालीस फीसदी भ्रष्टाचार तो इससे कम हो ही जाएगा। बताते हैं कि राहुल जी ने इस मामले में अगुवाई की। अब अन्ना जी कम से कम लोकपाल को लेकर तो अनशन नहीं करेंगे। बाकी की देखी जाएगी। अन्ना जी राहुल जी की तारीफ कर रहे हैं।
यह बात भाजपा से ज्यादा अरविंद जी को खटक रही है। पर ऐसा नहीं है कि अरविंद जी को कुछ भी न मिला हो। उन्होंने नेताओं और राजनीतिक पार्टियों के खिलाफ आंदोलन चलाया था। आंदोलन से उन्हें उनका मनचाहा लोकपाल बेशक न मिला हो, पर राजनीति जरूर मिल गई। देर-सबेर राज भी मिल ही जाएगा। नेताओं ने समझा था कि लोकपाल उनके खिलाफ है, लेकिन उन्हें लोकपाल मिल गया। इस चक्कर में राजनीति थोड़ी-बहुत उनके हाथ से खिसक गई हो। यानी जो जिसको नहीं चाहिए था, वही उन सबको मिला।