चुनावी लहजे से उत्तर प्रदेश देश का सबसे संवेदनशील प्रदेश है। 80 लोकसभा और 403 विधानसभा सीटों वाले इस प्रदेश में अगले साल चुनाव होने वाले हैं। सर्वे सर्वेक्षण आने लगे हैं। सब धीरे धीरे अपनी बिसात बिछा रहे हैं। मौजूदा समय की बात करें तो प्रदेश के दो मुख्य दल बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री के चेहरे प्रदेश की जनता के सामने हैं। रही बात भारतीय जनता पार्टी की तो यहां अभी सोशल मीडिया पर योगी सीएम पद के दावेदार बताए जा रहे हैं और चर्चा में स्मृति ईरानी भी हैं। कांग्रेस को अभी इस बहस में शामिल न करें तो ही बेहतर। खैर इन्होंने भी खुद को प्रशांत किशोर के हवाले कर ही दिया है। हाल ही में एक निजी समाचार चैनल की ओर से किए गए एक सर्वेक्षण में बताया गया है कि अगर अभी चुनाव हो जाएं तो बसपा फतह करेगी, सपा का सफाया होगा, भाजपा मलाई तक पहुंच कर भी केवल दूध ही पी सकेगी और कांग्रेस के लिए शायद छाछ बचना भी मुश्किल है। वैसे इस सर्वेक्षण पर मुन्नवर राणा की एक गजल याद आ गई।
''कलन्दर संगेमरमर के मकानों में नहीं मिलता
मैं असली घी हूँ ,बनिए की दुकानों में नहीं मिलता।''
उम्मीद है कि इस गजल के बाद आप सर्वेक्षण के बारे में मेरी राय जान चुके होंगे। यह पता नहीं कैसा संयोग कि बसपा सुप्रीमो चाहे मुख्यमंत्री रहें या न रहें लेकिन प्रदेश की राजनीति का केंद्र अवश्य रहती हैं। अगर प्रदेश में बसपा का नीला परचम लहरा गया तो वो विधान परिषद के रास्ते मुख्यमंत्री हो जाती हैं और अगर कहीं कोई चूक हो गई तो राज्यसभा उनका दूसरा राजनीतिक घर है ही। आपको याद तो होगा ही कि मायावती की सत्ता मूर्तियों, भ्रष्टाचार और उनके राज में भी कानून व्यवस्था सरीखे मुद्दों के नाम पर गई थी। सपा उस वक्त चल रही विरोधी लहर का फायदा उठाने में कामयाब हो गई और उसने बच्चों (छात्रों) के परिजनों को आर्थिक मदद, लैपटॉप का लॉलीपॉप और साइकिल की सीट पर बैठाकर सत्ता में आ गई। हमारी भारतीय राजनीति में एक बात आप लोगों ने जरूर गौर की होगी कि कोई भी अपने सकारात्मक मुद्दों और आवाज के चलते सत्ता की कुर्सी पर नहीं बैठता बल्कि हर कोई विपक्ष की गलतियों को अपनी ढाल बनाकर सत्ता में आता है। सपा ने पिछली बार सबसे ज्यादा निशाना मायावती और अन्य लोगों की मूर्तियों पर निशाना साधा था। अपने अक्खड़पन और बिंदास छवि के लिए जानी जाने वाली मायावती ने मूर्तियों पर उठ रहे सवालों का जवाब प्रेस में बखूबी दिया लेकिन जनता को उनका जवाब पसंद नहीं आया।
खैर अब बात करते हैं समाजवादी पार्टी और उसके बीते चार साल की। सरकार आई तो लोगों को हर बार की तरह उससे खास उम्मीद थी। हालांकि उन्हीं के दल के कई लोग अखिलेश के सीएम बनने से खुश नहीं थे। फिर भी इस बार उम्मीद ज्यादा थी क्योंकि मुख्यमंत्री कोई मुलायम या मायावती नहीं बल्कि युवा जोश से भरे अखिलेश यादव थे। अखिलेश ने सत्ता संभालते ही लखनऊ में मेट्रो की बात शुरू कर दी। फिलहाल वहां निर्माण कार्य जारी है। छात्रों को लैपटॉप देने की योजना पर भी अमल किया जाना शुरू कर दिया गया। साइकिल और छात्रवृत्ति सरीखी योजनाओं में भी तेजी लाई जाने लगी लेकिन एक वक्त ऐसा आया जब सरकार के हाथ पैर पंगु हो गए। वो वक्त था उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के खिलाफ छात्रों का आंदोलन। आंदोलन की वजह थी त्रि स्तरीय आरक्षण का लागू होना। इलाहाबाद समेत पूरे प्रदेश में 10 जुलाई 2013 से शुरू हुआ आंदोलन आज भी चल रहा है। करीब 3-4 महीने तक आयोग के घर यानी इलाहाबाद में बहुत अस्थिरता रही। मैं उस अस्थिरता का गवाह भी बना और आज आलम ये है कि छात्रों के बीच इतनी गहरी खाई पैदा हो गई कि अब वो शायद ही पट सके। इन सबसे पहले डीएसपी जिया उल हक की हत्या में रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया का नाम आना भी अखिलेश सरकार के लिए मुश्किल की घड़ी थी। जिसे सरकार ने किसी तरह नौकरी और मुआवजे देकर शांत करने की कोशिश की लेकिन वो विपक्ष का निशाना बन ही गए। इस हत्या के बाद जिस तरह से प्रदेश में भूचाल आया उससे एक बारगी लगा कि कहीं सत्ता फिर से मुलायम के हाथों तो नहीं चली जाएगी। हालांकि ऐसा नहीं हुआ और अखिलेश मुख्यमंत्री बने रहे।
ये बात समझने योग्य है कि 2014 में आम चुनावों से पहले अखिलेश सरकार उस ढंग से काम नहीं कर रही थी जिस तरह से उसे करना चाहिए था। आम चुनाव से पहले 2 साल में अखिलेश को कभी आजम खान, तो कभी शिवपाल यादव तो कभी खुद उनके पिता मुलायम सिंह यादव का दबाव झेलना पड़ता था। इतना ही नहीं इन सब के बीच अखिलेश बेचारे मुख्यमंत्री तक करार दे दिए गए और जब पार्टी को करारी हार मिली तो उसका ठीकरा अखिलेश के सर फोड़ दिया गया। लेकिन आम चुनावों में मिली हार ने शायद अखिलेश के दिमाग का ताला खोल दिया और उसके बाद उनके काम करने के तरीके में निखार आया। देखा जाए तो यह बात साफ जाहिर है कि अब अखिलेश खैरात बांटने से इतर अलग सोच का काम कर रहे हैं। हालांकि समाजवादी पार्टी के घोषणा पत्र में किए गए वादों को प्रतीक रूप में जारी रखा गया है। जैसे पहले लैपटॉप सबको दिए जाने की बात कही गई थी लेकिन अब वो तय मानक को पूरा करने वाले छात्रों को ही मिलेगा। इस चार साल में अखिलेश सरकार पर यह आरोप भी लगा कि वो धर्म विशेष की लड़कियों को छात्रवृत्ति देकर तुष्टिकरण कर रहे हैं।
जैसे- जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं अखिलेश बिजली, पानी और कानून व्यवस्था सरीखी बातों पर खुद ध्यान देने की बात कर रहे हैं। सरकार के चार साल पूरा होने पर उन्होंने उपलब्धियों का खाका दिखाया। बीते चार साल में बुंदेलखं की समस्या पर केवल भाषणबाजी ही चली और जो भी धन उस इलाके को आंवटित कराया गया वो शायद ही उन लोगों तक पहुंचा। हालांकि सरकार कह रही है कि होली के बाद वहां राहत पैकेज बांटा जाएगा। सरकार के लिए पूर्व आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर भी कम समस्या बन कर नहीं उभरे, बीते दिनों वो मुख्यमंत्री के आवास के सामने धरने पर बैठे थे। अमिताभ ठाकुर के मामले में अखिलेश को तब सबसे ज्यादा फजीहत झेलनी पड़ी जब खुद मुलायम सिंह यादव का नाम उन्हें धमकी देने में आ गया और बाकायदा उसकी रिकॉर्डिंग सामने आई।
और अब सबसे आखिर में मुजफ्फरनगर दंगों की बात। हालांकि मामले कि रिपोर्ट विधानसभा में पेश कर दी गई है। एक निजी चैनल के कथित तौर पर फर्जी स्टिंग पर सदन में कार्यवाही चल रही है और आजम खान के सीडी की ट्रांसक्रिप्ट राजभवन पहुंच चुकी है। इस मामले ने सरकार की खासा बेइज्जती कराई और यहां भी उन पर तुष्टिकरण का आरोप लगा। जानकार कहते हैं कि अगर उस समय ठीक तरह से कार्यवाही की गई होती जो एकतरफा न हो कर न्यायपूर्ण होती तो दंगे की शक्ल उतनी बड़ी होती ही नहीं।
इन सबके बाद यह देखना होगा कि जिस तरह से अखिलेश ने आम चुनाव में जनता के दिए फैसले के बाद खुद को चाचा, अंकल और चच्चू जान के चंगुल से छुड़ाया है। अपने पिता को भी इस बात का संदेश लगभग दिया कि अब आप बस 'देखिए'। क्या वो आगे जारी रह पाएगा खास तौर से तब जबकि जनता अखिलेश को दुबारा सीएम बना दे क्योंकि इस बात की उम्मीद बहुत कम ही दिखती है कि सत्ता में दुबारा आने का श्रेय अखिलेश यादव को मिले। शिवपाल यादव की अपनी अलग राजनीति है। आजम खान की बातें सुनकर भी उन पर कोई खास टिप्पणी न करने वाले अखिलेश को देख कर ऐसा लगता है कि वो (आजम )केवल वोट संभालने के लिए सरकार का हिस्सा हैं। अखिलेश को इस बात पर भी ध्यान देना होगा कि हाल ही में संपन्न हुए विधान परिषद चुनावों में सपा को कई जगह हार का सामना करना पड़ा हालांकि हर बार की तरह सत्ता इस बार फिर जीती लेकिन थोड़ा संभल कर चलना होगा। जिला पंचायत के चुनावों में सत्ता की मनमानी को अखिलेश ने जनता का मत बता दिया। ये सब कुछ वैसा ही है जब 2012 में अखिलेश के सीट छोड़ने पर डिंपल यादव कन्नौज से निर्विरोध चुनी गई थी जिस पर सपा ने जनता का शुक्रिया अदा किया था।