यह बात किसी हास्य कवि ने नहीं कही कि मैं सरकार हूं। उसका बस चले, तो वह अपनी पत्नी को सरकार घोषित करे, क्योंकि फिर पत्नी को जालिम और भ्रष्ट कहने की सुविधा हासिल हो जाती है। यह बात कोई धर्मभीरु भी नहीं कह सकता कि मैं सरकार हूं, क्योंकि उसके लिए तो ऊपरवाला ही सरकार है। यह बात किसी गुंडे, दादा या किसी माफिया ने भी नहीं कही कि मैं सरकार हूं, क्योंकि उसके लिए यह कहना अधिक बेहतर होता है कि सरकार मेरी जेब में है। जनता तो यह बात कह ही नहीं सकती कि मैं सरकार हूं, क्योंकि नेताओं, पत्रकारों, विद्वानों और यहां तक कि कई बार नौकरशाहों द्वारा बार-बार विश्वास दिलाए जाने पर भी वह यह भ्रम कभी नहीं पालती कि वही सरकार है या उसकी वजह से सरकार है। वह तो एक क्लर्क तक को सरकार मानने को तैयार हो जाती है।
यह बात इधर दिल्ली में लाट साहब ने कही कि मैं सरकार हूं। हालांकि छोटे-मोटे नेता भी यह नहीं कहते कि वे काउंसलर हैं, विधायक हैं या और कुछ और हैं। यह तो उनके साथ चलनेवाले चेले-चांटे ही बताया करते हैं कि साहब कौन हैं। पर लाट साहब ने ऐसी कोई चोंचलेबाजी नहीं की। हालांकि ऐसा तो नहीं होगा कि उनके चेले-चांटे न हों। चेलों के बिना आजकल कौन बड़ा आदमी रहता है? फिर भी उन्होंने खुद ही घोषित कर दिया कि मैं सरकार हूं। इस पर दिल्ली की गद्दी पर बैठी आम आदमी पार्टी नाराज हो गई कि जनता ने हमें चुना है, फिर आप सरकार कैसे हो गए जनाब? अखबारों में इसी पर चर्चा होने लगी। टीवी चैनलों के प्राइम टाइम पर बहसें आयोजित की गईं कि कौन सरकार है। हमारा मुल्क तो ऐसा है कि यहां लोगों के नाम तक के साथ सरकार सरनेम लगा है। दूसरी ओर, आम आदमी के लिए चपरासी भी सरकार है और थानेदार भी सरकार है। पंचायत के मुखिया से लेकर विधायक, सांसद सब सरकार हैं। फिर भी पता नहीं, लाट साहब को क्यों कहना पड़ा कि मैं सरकार हूं। और सरकार को ही क्यों लाट साहब को यह याद दिलाना पड़ा कि आप नहीं, सरकार तो हम हैं!