चुनाव तो जी देखो, चुने जाने के लिए ही होते हैं। जिम्मेदारियां देने और स्वीकार करने के लिए होते हैं, शपथ लेने और पद ग्रहण के लिए होते हैं। पर लगता है, यह चुनाव तो इस्तीफे देने के लिए ही हुआ है। चुनाव से पहले इस्तीफे मांगे जरूर जाते हैं, दस्तूर भी होता है। विपक्ष वाले सरकारवालों का इस्तीफा न मांगे, तो मिलीभगत का आरोप लगने का खतरा रहता है। पर इधर तो वही बात हो रही है कि बिन मांगे इस्तीफे ही इस्तीफे मिले।
भाजपा को छोड़कर जैसे हर पार्टी में इस्तीफों की बहार आई हुई है। अचानक सब नेता जैसे जिम्मेदार हो उठे हैं। सब यही कह रहे हैं कि हार के लिए मैं ही जिम्मेदार हूं, मेरा इस्तीफा ले लो। पार्टियों के अध्यक्ष तक इस्तीफा दे रहे हैं। जिनके बिना पार्टी की कल्पना तक नहीं की जा सकती, वे लोग तक इस्तीफा दे रहे हैं। इतने इस्तीफों की पेशकश है कि डर लग रहा है कि कहीं पार्टियां नेतृत्वविहीन न हो जाएं। धरती वीरों से खाली न हो जाए। अगर इसी तरह इस्तीफे होते रहे, तो सरकारें बचेंगी भी या नहीं।
शुक्र है कि बिहार के मुख्यमंत्री ने इस्तीफा दिया, तो दूसरा मुख्यमंत्री उन्होंने वक्त रहते खुद ही ढूंढ लिया। इस मायने में वह जिम्मेदार निकले। हार की जिम्मेदारी सोनिया और राहुल गांधी ने भी ली। वे भी इस्तीफे का मन बनाकर बैठक में आए थे, हालांकि जानते थे कि उनके इस्तीफे स्वीकार नहीं होंगे। लेकिन इस्तीफा न देने की वजह से कोई उन्हें कम जिम्मेदार नहीं बता सके। बल्कि वे जिम्मेदार हैं, तभी तो पार्टी को नए सिरे से खड़ा करने की जिम्मेदारी ले रहे हैं!
सपा और बसपा जैसी पार्टियां इस मामले में ज्यादा 'सक्रिय' निकलीं। उन्हें आशंका थी कि हार के जिम्मेदार लोग खुद इस्तीफा शायद न दें, इसलिए खुद ही आगे बढ़कर बड़े लोगों को बाहर निकालने का कदम उठा लिया। हार बड़ी है, इसलिए पार्टी से निकाले जाने वाले लोग भी बड़े-बड़े ही हैं। इसके बाद भी मुलायम और मायावती की पार्टी पर अगर कोई व्यंग्य करे, तो उनकी सोच पर हंसा ही जा सकता है।