नरेंद्र मोदी ने कहा क्या और हमने सुना क्या? यह सवाल पूछना इसलिए जरूरी हो गया है, क्योंकि जब भी कुछ कहते हैं गुजरात के मुख्यमंत्री इन दिनों, सुनाई कुछ और देता है। हर बात पर हंगामा होता है और कई बार उस बात को लेकर, जो उन्होंने कही ही नहीं।
यहां यह कहना जरूरी है कि कुछ कुसूर उनका भी है। उनसे जब 2002 के दंगों के बारे में पूछा जाता है, तो जवाब स्पष्ट शब्दों में दिया जाना चाहिए, न कि गोलमोल मुहावरों में।
सो विदेशी समाचार एजेंसी रॉयटर्स को इंटरव्यू देते समय साफ कहना चाहिए था उन्हें, कि उनको दुख है कि उनके मुख्यमंत्री होते हुए बेगुनाह लोग मारे गए। कुत्ते के पिल्ले वाली बात बेतुकी थी, बेमतलब थी।
फिर जब पूछा गया उनसे कि वह अपने आपको राष्ट्रवादी हिंदू मानते हैं या नहीं, तो उनका जवाब था, मैं राष्ट्रवादी हूं, देशभक्त हूं और पैदा हुआ हूं हिंदू घर में, तो अगर यह मतलब है राष्ट्रवादी हिंदू होने का, तो मैं हूं। इस बात को सेक्यूलर लोगों ने इस तरह समझा कि वह स्वीकार कर रहे हैं कि वह सिर्फ हिंदुओं के नेता हैं।
पिछले रविवार को उन्होंने पुणे के फर्गुसन कॉलेज वाले भाषण में कांग्रेस के बारे में कहा कि जब भी कोई महत्वपूर्ण विषय पर उनसे सवाल पूछा जाता है, तो सेक्यूलरिज्म का बुर्का पहन लेते हैं इस पार्टी के नेता। अभी महंगाई के बारे में न पूछो, सेक्यूलरिज्म खतरे में है...अभी देश की सुरक्षा की बात न करो, सेक्यूलरिज्म खतरे में है...।
इस बात को लेकर कांग्रेस के वरिष्ठ मंत्रियों ने यह समझा कि मोदी सीधा हमला कर रहे हैं मुसलमानों की परंपराओं पर। तो क्या उन्होंने बुर्के की जगह पर्दा शब्द का इस्तेमाल किया होता, तो हंगामा कम होता? इससे भी अहम सवाल यह है कि कांग्रेस ने पिछले पैंसठ वर्षों से ऐसा नहीं किया है क्या?
सच तो यह है कि सेक्यूलरिज्म की छत्रछाया में कई नाकामियों को छिपाने का काम हुआ है बहुत बार। आज देश के सामने महत्वपूर्ण सवाल है विकास का, सुशासन के गंभीर अभाव का।
कितनी शर्म की बात है कि बिहार के एक स्कूल में छोटे बच्चे इसलिए मरे कि उन्होंने मिड डे मील खाया। ऐसा कभी न होता, अगर देश के ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सफाई की समझ आ गई होती पिछले पैंसठ वर्षों में। बच्चों के खाने में जहरीले रसायन थे।
हमारे ग्रामीण क्षेत्रों में सफाई की इतनी कम समझ है कि ज्यादातर बच्चे मरते हैं उन बीमारियों से, जो गंदगी और गंदे पानी से पैदा होती हैं।
इससे जुड़े हैं कई जरूरी सवाल। स्वास्थ्य सेवाओं का इतना बुरा हाल क्यों है कि अस्सी प्रतिशत से ज्यादा भारतीय निजी डॉक्टरों से इलाज करवाने पर मजबूर हैं? सरकारी स्कूलों का इतना बुरा हाल क्यों है कि गरीब लोग भी अपने बच्चों को निजी स्कूलों में भेजने पर मजबूर हैं?
अभी उत्तराखंड में हजारों की तादाद में लोग जिस तरह मरे हैं, किसी विकसित देश में कभी न मरते, क्योंकि वहां सड़कें इस तरह नहीं टूटतीं, जैसे टूटी थीं उत्तराखंड में। यानी हर तरह से, हर राज्य में सुशासन के अभाव के कारण आम आदमी बेहाल है।
बेहाल हैं हिंदू भी और मुसलमान भी, लेकिन जो राजनेता गर्व से पहने रहते हैं सेक्यूलरिज्म का बुर्का, उनको दिखती हैं ऐसी चीजें, जो हमको-आपको नहीं दिखतीं। याद कीजिए कि बोधगया के महाबोधि मंदिर में बम फटने के बाद कांग्रेस के अति सेक्यूलर दिग्विजय सिंह ने कहा था कि भारत में हिंसा की हर वारदात के पीछे हिंदू होते हैं। यह कोई बात हुई?
नरेंद्र मोदी अपनी पहचान एक अलग किस्म के राजनेता की कायम करना चाहते हैं, तो राजनीतिक तौर पर गलत नहीं कर रहे। सेक्यूलरिज्म की अहमियत वैसे भी कम हो गई है, क्योंकि 350 निजी टीवी समाचार चैनलों ने दंगों का फैलना बहुत मुश्किल कर दिया है।
समस्या मेरे सेक्यूलर पत्रकार बंधुओं की यह है कि वे देश की असली समस्याओं को बार-बार भूल जाते हैं, जब भी उनको सुनाई देता है सेक्यूलर शब्द। यानी सेक्यूलरिज्म के बुर्के में सिर्फ राजनीतिज्ञ नहीं हैं, हम सेक्यूलर पत्रकार भी छिपे बैठे हैं।
सो नरेंद्र मोदी विकास की, आत्मविश्वास की, देश की दिशा बदलने की चाहे जितनी भी बातें करेंगे, हमको सुनाई देंगी सिर्फ वे बातें, जिनमें धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिकता की गूंज हो।