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शैक्षणिक गरिमा की परवाह आखिर किसे है

Wed, 25 Jun 2014 10:48 AM IST
नंदिनी सुंदर
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दिल्ली यूनिवर्सिटी (डीयू) के चार वर्षीय अंडरग्रेजुएट पाठ्यक्रम पर जो विवाद हो रहा है, उसके नतीजों की चिंता सिर पर न खड़ी होती, तो यह सारा वाकया किसी तमाशे से कम नहीं लगता। सच तो यह है कि यूनिवर्सिटी का एफवाययूपी (फोर ईयर अंडरग्रेजुएट प्रोग्राम) को इस तरह लागू करना सवाल खड़े करता है, मगर यूजीसी का भी यूनिवर्सिटी प्रशासन और अकादमिक परिषद पर इस तरह आक्रामक होने का औचित्य नहीं बनता। आज अगर यूजीसी कॉलेजों के प्राचार्यों को तीन वर्षीय कार्यक्रम फिर से लागू न करने की सूरत में फंड में कटौती करने की धमकी दे रहा है, तो कल वह इन पर वैदिक ज्योतिष शास्त्र या आधिकारिक संपर्क के लिए केवल हिंदी भाषा के उपयोग का दबाव बना दे, तो कोई हैरत नहीं होनी चाहिए। वैसे कइयों का यह भी मानना है कि इन हालात के लिए खुद कुलपति जिम्मेदार हैं, और अब इस्तीफा देने के सिवाय उनके पास कोई चारा नहीं बचा है। मगर ऐसी सूरत में सरकार को तय समय से पहले ही इस पद पर पसंदीदा व्यक्ति की नियुक्ति का मौका मिल जाएगा, मगर इससे भी बुरा यह होगा कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय को यह महसूस होने लगेगा कि यूजीसी के जरिये वह विश्वविद्यालयों के साथ कैसा भी बर्ताव्ा कर सकता है।
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दिल्ली यूनिवर्सिटी में दाखिले के लिए लाखों विद्यार्थी आवेदन करते हैं, इनमें से कई तो बेहद मेधावी होते हैं। इन विद्यार्थियों के नजरिये को समझने से पता चलता है कि उनके लिए तीन या चार वर्ष मायने नहीं रखते, बात है डीयू के ब्रांड नाम की, जिसके साथ जुड़ी है बौद्धिकता और सामाजिक रोमांच की एक वचनबद्धता। यहां कई ऐसे शिक्षक हैं जो अपनी जिम्मेदारियों को नहीं समझते, मगर पढ़ाने वाले योग्य शिक्षकों की भी यहां कमी नहीं है। ये शिक्षक एफवाययूपी की बहस के दोनों पक्षों में खड़े दिखते हैं। जिस तरह इस विवाद ने पूरे शिक्षक समुदाय को दो धड़ों में बांट दिया है, वह निंदनीय है।

दरअसल डीयू ने यदि कानूनों का उल्लंघन किया है, तो यूजीसी भी कम दोषी नहीं है, जो वर्ष भर इस मुद्दे पर उदासीन दिखा। अगर विश्वविद्यालय के विजिटर (राष्ट्रपति) की मंजूरी या राष्ट्रीय (10+2+3) नीति का उल्लंघन के मुद्दे पर पूरे साल उसने ध्यान नहीं दिया, तो एकाएक क्या हो गया कि रविवार को नोटिस जारी करने की नौबत आ गई। यूजीसी शिक्षा के विनियमन को प्रतिबद्ध एक स्वतंत्र सांविधिक और स्वायत्त निकाय है, मगर सत्ताधारी दल को खुश करने का ऐसा नमूना उसने कभी नहीं दिखाया।
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अंत में यही कहा जा सकता है, अगर मामले से जुड़े सभी पक्ष कुछ कदम पीछे हटने को तैयार हों, तो इस संकट से उबरा जा सकता है। बस यूजीसी अपने निर्देश वापस ले, डीयू अंडरग्रेजुएट कार्यक्रम की कमियों को दुरुस्त करे, अकादमिक परिषद इस मुद्दे पर फिर से विचार करने और एफवाययूपी और फाउंडेशन पाठ्यक्रमों पर जो भी असंतोष है, उस पर ध्यान देने को राजी हो जाए। इससे यही होगा कि नए दाखिलों को कुछ हफ्तों के लिए टालना पड़ जाएगा, पर एक यूनिवर्सिटी और उसकी अकादमिक गरिमा की रक्षा के लिए इतना नुकसान तो झेला ही जा सकता है।
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(लेखिका डेल्ही स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में प्रोफेसर हैं)
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