मुजफ्फरनगर 1958 में छूटा। तब से मैं बाहर ही हूं। जब तक बाबू जी रहे, मैं आता-जाता रहता था। अब वह भी छूट गया। वहां हमारी एक खंडहर हवेली पुराने मोतीमहल में है। आज जब मैं अखबारों में छपी खबरों के आलोक में देखता हूं, तो मुझे मुजफ्फरनगर दुर्दांत पशु के डर से कांपते खरगोश की तरह सेना के सिपाहियों के पीछ दुबका-सा नजर आता है। मैं वहीं पला-बढ़ा। सनातन धर्म कॉलेज में बी ए तक की शिक्षा हुई। 15 अगस्त, 1947 को मैं स.ध. स्कूल में छठी क्लास में पढ़ता था। झंडा फहराते हुए बच्चों में कितना उत्साह था, इतनी प्रभात फेरियां निकलती थीं कि छोटी गलियों में जाम लग जाता था। हिंदू-मुसलमान सब नए-नए कपड़े पहनकर आजादी के उत्सव में शामिल हुए थे। जगह-जगह मिठाई बंट रही थी। आज क्या हो गया उस मुजफ्फरनगर को?
मेरे बाबा ला. हरिशंकर लाल अच्छे-खासे रईस थे। उनको लोग मानते थे। उनके कई मित्र मुस्लिम थे। वहां के बड़े वकील सैयद जाफर हुसैन उनके दोस्तों में एक थे। उनके यहां शादी थी। वैसे तो वह कांग्रेस में थे, लेकिन जब बंटवारे का मुद्दा उठा, तो पता नहीं कैसे मुस्लिम लीग में चले गए। नगर में काफी विरोध हुआ। उस जमाने में शादियों में, चाहे मुसलमान के यहां हो या हिंदू के घर, सब एक दूसरे के घर जाते थे। उस विरोध के कारण कुछ हिंदू नाराज हो गए, उन्होंने बाबा से कहा कि आप उनके यहां शादी में जाने से मना कर दें। उन्होंने कहा, 'जाफर साहब के वालिद के जमाने से हमारे ताल्लुकात हैं, हम एक दूसरे के बच्चों को अपने बच्चे मानते हैं। मैं अपने बच्चों की शादी में शामिल कैसे नहीं होऊंगा।' हम सब लोग गए।
मुझे याद है कि जाफर साहब कमरे का दरवाजा पकड़े बाहर खड़े थे। हिंदू परोस रहे थे। हिंदू खाना बनाने वाले थे। हमारे यहां उनका हुक्का और बरतन अलग था। मुझे बहुत बुरा लगता था। पर अब सोचता हूं, बरतन अब एक हो गए, दिल बंट गया। ऐसा क्यों हुआ? किसने यह किया? वह जमाना अच्छा था, जब दिल नहीं बंटे थे। उनके यहां भी बाबा के लिए एक हिंदू नौकर था, वह उनके लिए पानी और फल चांदी के ग्लास और तश्तरी में लाता था। महिलाएं भी एक-दूसरे के घरों में आती जाती थीं। फिर चाहे दीवाली हो या ईद।
दंगे तब भी होते थे। खासतौर से दशहरे पर या मोहर्रम पर। दरअसल जब दशहरे पर राम की बारात निकलती थी और नमाज का वक्त होता था, तो उस वक्त बाजे के कारण दोनों में तनाव बढ़ जाता था। कभी अलम या ताजिया इतना ऊंचा होता था कि जुलूस फंस जाता था, फिर तेवर चढ़ जाते थे। दंगे की आशंका होते ही कलेक्टर दोनों वर्गों के मुअजिज लोगों की बैठक बुलाकर सबके मुचलके ले लेता था। दोनों तरफ बाअसर लोग अपने अपने जुलूस के आगे चलते थे।
अब यह तरीका तर्क कर दिया गया। मेरे बाबा से एक अंग्रेज कलेक्टर ने मुचलके के लिए कहा, तो उन्होंने आपत्ति की। क्या हम लोग दंगे कराते हैं? राय बहादुर जगदीश प्रसाद हमारे खानदानी थे। वह भी बाबा थे। उन्होंने उनका समर्थन किया। इस पर बहस हो गई। मुस्लिमों ने भी ऐतराज करना शुरू कर दिया। तब कुंवर असगर अली और बाबा ने प्रस्ताव रखा, आप किसी का मुचलका न लें। हम दोनों इस बात की जिम्मेदारी लेते हैं कि दंगा नहीं होने देंगे। कलेक्टर मान गया। उस जमाने में इतना विश्वास था। उन लोगों ने अपने-अपने लोगों की मीटिंग की, लोगों को समझाया और त्योहार शांति से गुजर गए। तब ऐसे मौकों पर एस.पी. और कलेक्टर घोड़ों पर साथ-साथ चलते थे।
पहले भारतीय आई.जी. लहरी साहब सहारनपुर के एस.पी. थे। देवबंद तनाव वाला इलाका था। रामलीला का जुलूस निकल रहा था। वहां दंगे के आसार रहते थे। मोहर्रम और दशहरा साथ थे। किसी बात पर विवाद हुआ। एस.पी. ने कुछ लोगों को एहतियातन हिरासत में ले लिया। इस पर नाराजगी हो गई। लहरी साहब पर एक मस्जिद की तरफ से गंडासा फेंका गया। वह घोड़े की टांग पर लगा, वह कट गई। लहरी साहब ने उसे पहचान लिया था। पर उन्होंने उस वक्त कुछ नहीं कहा। जुलूस निकलने दिया।
अगले दिन हिंदू और मुसलमान सब उस आदमी को लेकर गए, माफी मांगी। लहरी साहब ने उसे समझाया और हिरासत में रखा। जब लहरी साहब से पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि मैं निश्चित तौर पर नहीं कह सकता कि यही शख्स गंडासा फेंकने वाला था।
दरअसल वहां के बुजुर्गों ने मजफ्फरनगर को हर लौ से बचाकर रखा था। आज तो मुजफ्फरनगर शहर-ए-जरायम माना जाने लगा। तब शांति पसंद शहर था। इसी तरह आस-पास के इलाके थे। छोटे-मोटे मसले तो वहां के प्रभावशाली लोग ही निपटा लेते थे। दरअसल उस वक्त लोगों में एतबार था। अब राजनीति में कौन किसके साथ है और किसी जाति या धर्म की बहुतायत कहां है, इस बात से गुनाह भी तय होता है और बेगुनाही भी। नौकरशाही भी कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहती। उसे सुरक्षा चाहिए। राजनीति को वोट से मतलब है। धीरे-धीरे शहर-मोहल्ले बंटते चले जाते हैं। वहां सुकून की जड़ें खुद जाती हैं। राजनीति कभी जाति के नाम पर वोट खरीदती है या रोटी के नाम पर, या फिर नफरत इतनी घोल दी जाती है कि प्यार-मोहब्बत दूध की तरह फट जाता है।
मुजफ्फरनगर ऐसा न था। वहां खुले खेत थे। बागान थे। काली नदी का किनारा था। लोग एक दूसरे की गमी में शरीक होते थे। ऐसा नहीं था कि कोई मजदूर बच्चे की लाश अपने गांव ले जाने के लिए पुलिस से मदद मांगे और वह उसे कर्फ्यू में मदद न करे। वहां तो लोग प्यार में जीकर मरते थे। अब नफरत से मर रहे हैं।