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किस दिशा में जाएगी तमिल राजनीति

आर राजगोपालन Updated Wed, 08 Aug 2018 05:26 PM IST
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mgr with karunanidhi

भारतीय राजनीति की एक किकरुणानिधि के निधन से जो क्षति हुई है, उसकी भरपाई बहुत मुश्किल है। दशकों बाद ऐसा पहली बार होगा, जब 2019 के लोकसभा चुनाव करुणानिधि और जयललिता की अनुपस्थिति में होंगे।


भारतीय राजनीति की एक किवदंती बन चुके एम करुणानिधि को आखिरकार चेन्नई के मरीना बीच पर स्थित उनके गुरु सी आर अन्नादुरई की समाधि के नजदीक ही जगह मिली। राज्य की अन्नाद्रमुक सरकार ने उनके अंतिम संस्कार के लिए मरीना बीच पर जगह देने से इन्कार कर दिया था, जबकि यह वही जगह है, जहां अन्ना दुरई के साथ ही एमजीआर और जयललिता की समाधियां हैं। जिंदगी भर राजनीतिक लड़ाई लड़ने वाले करुणानिधि की समाधि के लिए उनकी पार्टी को अदालती लड़ाई लड़नी पड़ी, जिसके फलस्वरूप मद्रास हाई कोर्ट ने मरीना बीच पर उनका अंतिम संस्कार करने की इजाजत दी। इससे ही पता चलता है कि करुणानिधि होने का मतलब क्या है। 


वह पिछले कुछ महीने से बीमार थे और जब मंगलवार को उनकी हालत बिगड़ने लगी, तो उनके हजारों समर्थकों का हुजूम 'कलाइंगर' की तस्वीरें लिए उमड़ पड़ा था। इनमें महिलाओं और बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक थे। इसके बाद उनकी अंतिम यात्रा में भी जिस तरह से उनके समर्थक और तमाम पार्टियों के राष्ट्रीय नेता पहुंचे, वह भारतीय राजनीति में उनके महत्व को रेखांकित करता है। मगर इस कद्दावर नेता को सिर्फ श्रद्धांजलि देना पर्याप्त नहीं होगा, जिसका सार्वजनिक जीवन आठ दशक लंबा था।


करुणानिधि ने दशकों तक अपने लेखन, अपनी कला और अपनी राजनीति से तमिलनाडु को दिशा दी थी। उनके आदर्श और उनकी सोशल इंजीनियरिंग ने खासा प्रभाव डाला है; मगर उनके द्रविड़ आदर्शवाद से नई पीढ़ियां कितना प्रभावित होंगी, कहा नहीं जा सकता। तो क्या करुणानिधि के निधन से द्रविड़ आंदोलन का अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा? क्या उच्च जातियों और ईश्वर के अस्तित्व के खिलाफ उनके द्वारा चलाए गए आंदोलन का अंत हो गया है? तमिलनाडु में द्रविड़ आंदोलन को आखिर आगे कौन बढ़ाएगा? 


वैसे द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (द्रमुक) के सामने इस वक्त सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यह है कि वह करुणानिधि के निधन से उपजे संकट से कैसे उबरेगी। उनकी अनुपस्थिति से द्रमुक की आंतरिक संरचना पर फर्क पडे़गा। उनके रहते ही पार्टी के भीतर पीढ़ियों का टकराव दिखने लगा था। पार्टी के भीतर तकरीबन वैसी ही परिस्थितियां उत्पन्न हो गई है, जिनसे कांग्रेस पार्टी को जूझना पड़ा है। 


करुणानिधि काफी समय से बीमार थे और पार्टी के मामलों में फैसले लेने की स्थिति में नहीं थे, मगर उनकी उपस्थिति पार्टी के लिए बड़ा संबल थी। अब उनके बिना पार्टी के भविष्य से जुड़े सवालों पर विश्लेषकों ने मंथन शुरू कर दिया है। पार्टी के लिए 2019 के लोकसभा चुनाव परीक्षण की तरह होंगे। इनसे ही पता चलेगा कि एम के स्टालिन द्रमुक को किस तरह आगे बढ़ाते हैं, जिन्हें करुणानिधि ने अपना उत्तराधिकारी चुना था। 


करुणानिधि को किसी कविता, कथानक या कला के किसी और रूप में दी जाने वाली श्रद्धांजलि पर्याप्त नहीं होगी। वह इनसे अधिक के हकदार हैं, जिन्होंने तमिलनाडु में संस्कृति के विकास में अमूल्य योगदान दिया। उन्होंने कला और राजनीति के बीच अद्भुत संतुलन बनाया, हालांकि द्रविड़ राजनीति उनका मूल आधार थी। ई वी रामास्वामी नाइकर और सी एन अन्नादुरई के शिष्य के रूप में करुणानिधि ने अपनी अभिव्यक्ति और समझ को तराशा और फिर उसका इस्तेमाल तमिलनाडु के एक-एक गांव तक द्रविड़ आंदोलन को पहुंचाने में किया। 
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ऐसे कद्दावर नेता की भरपाई तो मुश्किल है ही, इसलिए द्रमुक के भविष्य पर सबकी नजर है। करुणानिधि ने जिंदगी भर तमिलनाडु की राजनीति की, लेकिन दशकों तक उन्होंने राष्ट्रीय राजनीति को भी प्रभावित किया। लेकिन द्रमुक की एक बड़ी मुश्किल यह भी है कि पार्टी की राजनीति को करुणानिधि के परिवार की राजनीति ने भी खासा प्रभावित किया है। एम के स्टालिन का राजनीतिक नजरिया निश्चय ही करुणानिधि से अलग है, लेकिन क्या वह द्रमुक के पुराने नेताओं को साथ लेकर चल सकेंगे?


क्या स्टालिन अपने बड़े भाई अलागिरी के साथ तालमेल बिठा पाएंगे? कनिमोझी का भविष्य क्या है? हालांकि अभी यह पूछने का ठीक समय नहीं है, इसके बावजूद राजनीतिक हलकों में एक सवाल यह भी है कि क्या द्रमुक में विभाजन तो नहीं हो जाएगा? आने वाला समय ही इन प्रश्नों के उत्तर देगा। तमिलनाडु की राजनीति पर नजर रखने वाले प्रेक्षक द्रमुक की अंदरूनी राजनीति पर नजर रखे हुए हैं और यह जानने के लिए उत्सुक हैं कि यह 2019 के लोकसभा चुनाव को कितना प्रभावित करेगी। 



उत्तर से अलग क्यों है दक्षिण की राजनीति


करुणानिधि के अस्वस्थ होने और फिर उनके निधन के बाद उनके समर्थकों का जिस तरह से हुजूम उमड़ पड़ा उसने एक बार फिर दक्षिण भारत की उस राजनीति को रेखांकित किया जिसमें समर्थक अपने नेता को अंधभक्ति की हद तक ईश्वर की तरह पूजते हैं। उत्तर भारत में नेताओं की लोकप्रियता के बावजूद उनके प्रति ऐसा अनुराग नजर नहीं आता। आखिर ऐसा क्यों है? इसका जवाब है कट्टरता। दक्षिण भारत में आम जन अपने नेताओं को पूजते हैं।


तमिलनाडु में जहां एमजीआर, जयललिता और करुणानिधि इसके उदाहरण हैं, वहीं आंध्र प्रदेश में एनटी रामाराव और कर्नाटक में राजकुमार। इन सारे नेताओं का बड़ा जनाधार रहा। वास्तव में उनके प्रति इस अंधभक्ति की एक बड़ी वजह है सिनेमा, जिसने इन सबको नायकत्व प्रदान किया। रुपहले पर्दे का जादू व्यावहारिक राजनीति में पागलपन की हद तक दिखता है। उत्तर भारत के किसी राज्य में ऐसा नजर नहीं आता। करुणानिधि या एमजीआर के बैनर पर उनके समर्थकों को दूध उड़ेलते देखकर आप क्या कहेंगे? जी नहीं, यह मनोरोग नहीं, बल्कि आस्था है। 


वास्तव में करुणानिधि के निधन से तमिलनाडु और तमिल भाषा को जो क्षति हुई है, उसकी भरपाई बहुत मुश्किल है। कई दशकों बाद ऐसा पहली बार होगा, जब 2019 के लोकसभा चुनाव करुणानिधि और उनकी प्रतिद्वंद्वी जयललिता की अनुपस्थिति में होंगे। पहली बार रजनीकांत और कमल हासन खुद को आजमाते नजर आएंगे। तमिलनाडु की राजनीति में अभी बहुत कुछ होना बाकी है। 
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