एक दिन अस्त-व्यस्त बालों वाला घुमक्कड़ दरवेश शम्स तबरेज धार्मिक विद्वान जलालुद्दीन रूमी के यहां पहुंचा। रूमी उस वक्त किताबों के ढेर के पास बैठे कुछ पढ़ रहे थे। उन्होंने रूमी से पूछा, तुम क्या कर रहे हो? रूमी को लगा कि वह कोई अनपढ़ अजनबी है। उन्होंने व्यंग्यपूर्वक जवाब दिया, मैं जो कर रहा हूं, उसे तुम नहीं समझ पाओगे।
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यह सुनकर शम्स ने किताबों को, जो खुद रूमी ने लिखा था, उठाकर पास के एक तालाब में फेंक दिया। रूमी भागकर उन किताबों को तालाब से निकाल लाए, मगर यह देखकर हैरान रह गए कि सभी किताबें सूखी थीं। रूमी ने शम्स से पूछा, यह सब क्या है? शम्स ने जवाब दिया, मौलाना, इसे आप नहीं समझ पाएंगे।
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फिर क्या था, इस घटना के बाद से रूमी उस घुमक्कड़ के गुलाम हो गए। मगर रूमी के शिष्य और साथी को अपने गुरु और दोस्त के ऊपर शम्स का अधिकार जमाना पसंद नहीं था। एक रात शम्स को किसी ने दरवाजे पर बुलाया। वह बाहर गए, और फिर उसके बाद उन्हें किसी ने नहीं देखा। ऐसा कहा जाता है कि रूमी के बेटे अलाउद्दीन की मिलीभगत से शम्स का कत्ल कर दिया गया।
शम्स से बिछुड़ने के बाद रूमी के ऊपर आध्यात्मिक उन्माद छा गया। वह गलियों में नाचते हुए घूमते और गाने गाते। शम्स को खोजते-खोजते रूमी सीरिया की राजधानी दमिश्क तक चले गए। वहां रेगिस्तान में उन्हें एहसास हुआ कि ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसे खोजने के लिए भटका जाए।
उन्हें लगा कि वह ईश्वर या शम्स को इसलिए नहीं खोज पाए, क्योंकि वे तो हमेशा उनके अंदर ही रहते हैं। उस दिन के बाद से शम्स के साथ उन्होंने जो रहस्य और प्रेम बांटा था, उसे अभिव्यक्त करने में उन्होंने अपना पूरा जीवन लगा दिया।