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क्या दूसरा पाकिस्तान बनेगा: कट्टरपंथियों का मोहरा बन सकती है बांग्लादेशी हुकूमत, कटघरे में 'सुप्रीम फैसले'

डॉ. अमित सिंह (एसो. प्रोफेसर, राष्ट्रीय सुरक्षा विशिष्ट अध्ययन केंद्र, जेएनयू) Published by: ज्योति भास्कर Updated Tue, 03 Jun 2025 09:21 AM IST

सार

बांग्लादेश के सुप्रीम कोर्ट द्वारा कभी राष्ट्र विरोधी करार दिए गए कट्टरपंथी संगठन जमात-ए-इस्लामी को चुनाव में शामिल होने की मंजूरी देना और इसके कुछ दिन पहले मृत्युदंड प्राप्त दोषी अजहरुल इस्लाम को बरी करना, यही दर्शाता है कि वहां की हुकूमत कट्टरपंथियों का मोहरा बन पाकिस्तान की तरह बर्बादी की राह पर चल पड़ी है। 
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बांग्लादेश की राजनीतिक हलचल पर नजरें - फोटो : अमर उजाला प्रिंट


बांग्लादेश का लक्ष्य था कि 2031 तक उच्च-मध्यम आय वाला देश बनना, लेकिन मौजूदा राजनीतिक अस्थिरता और अशांति अर्थव्यवस्था को नीचे की ओर ले जा रही है। बांग्लादेश ने ऐतिहासिक रूप से आर्थिक लचीलापन दिखाया है, लेकिन मौजूदा संकट वित्तीय जोखिमों को बढ़ा रहा है, जिसमें विदेशी भंडार पर दबाव, क्रेडिट रेटिंग में गिरावट और परिधान निर्यात जैसे प्रमुख उद्योगों में व्यवधान शामिल हैं। मुद्रास्फीति 10 फीसदी के करीब पहुंच रही है, निर्यात कमजोर हो रहा है, ऊर्जा संकट और बेरोजगारी बढ़ रही है, तेज मूल्यह्रास के कारण आयात लागत बढ़ रही है, जिससे अर्थव्यवस्था में विश्वास बहाल करने के लिए संघर्ष कर रही अंतरिम सरकार पर दबाव बढ़ रहा है। यूनुस अर्थव्यवस्था को ‘सुधारने’ के लिए चीन से लगातार कर्ज ले रहे हैं, लेकिन इससे बांग्लादेश को मदद नहीं मिलने वाली, बल्कि पाकिस्तान की तर्ज पर उसके चीन का गुलाम बनने की आशंकाएं बढ़ेंगी, जो भारत की चिंता का कारण बन सकती हैं।


हाल ही में बांग्लादेश के सुप्रीम कोर्ट ने जमात-ए-इस्लामी, जोकि एक कट्टरपंथी, पाकिस्तान-परस्त एवं भारत विरोधी संगठन है, का रजिस्ट्रेशन बहाल कर दिया है, जबकि 2013 में इसी अदालत ने जमात-ए-इस्लामी पार्टी को राष्ट्रीय चुनाव में भाग लेने के लिए अयोग्य माना था और उसका पंजीकरण रद्द कर दिया था। पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के कार्यकाल में इसकी राष्ट्र विरोधी गतिविधियों के चलते प्रतिबंध लगाया गया था। बीते साल शेख हसीना के अपदस्थ होने के बाद जमात ने अदालत के फैसले की समीक्षा की मांग की थी। इस पर मोहम्मद यूनुस ने पार्टी से प्रतिबंध हटाया, तो अब सुप्रीम कोर्ट ने पंजीकरण बहाल कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कुछ ही दिन पहले जमात के एक शीर्ष नेता और मृत्युदंड प्राप्त दोषी अजहरुल इस्लाम को भी बरी कर दिया था। 


अजहरुल इस्लाम पर मुक्ति संग्राम के दौरान पाकिस्तानी सेना का साथ देकर मानवता के खिलाफ अपराध करने का आरोप था। अंतरिम सरकार के कानूनी सलाहकार आसिफ नजरुल ने इस्लाम की रिहाई का स्वागत भी किया। जमात ने 1971 में बांग्लादेश की पाकिस्तान से स्वतंत्रता का विरोध किया था। ऐसे में उसका चुनाव लड़ना बांग्लादेश के भविष्य के लिए एवं सुरक्षा के मद्देनजर भारत के लिए भी ठीक नहीं है। 


पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की मुश्किलें अब और भी बढ़ गई हैं, क्योंकि बांग्लादेश के अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण (आईसीटी-बीडी) ने हसीना और दो अन्य व्यक्तियों पर पिछले वर्ष हुई हिंसा के लिए मुकदमा चलाने की अनुमति दी है। वहीं, यूनुस ने शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग को भंग कर दिया है। अवामी लीग की अनुपस्थिति में उसकी प्रमुख प्रतिद्वंद्वी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी), जिसकी अगुवाई पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया कर रही हैं, देश की राजनीति में प्रमुख भूमिका में उभर आई है। इसी दौरान जमात-ए-इस्लामी का पंजीकरण बहाल किया जाना बहुत कुछ कहता है। बांग्लादेश ने नए बैंक नोट भी जारी कर दिए हैं, जिनमें बांग्लादेश के निर्माता शेख मुजीबुर्रहमान की तस्वीर को हटा दिया गया है। वर्तमान स्थिति की बात करें, तो जिस प्रकार से मोहम्मद यूनुस चरमपंथियों की गोद में बैठकर शासन चला रहे हैं, वह बांग्लादेश में हर उस निशान को मिटा देना चाहते हैं, जिसके माध्यम से बांग्लादेश का निर्माण हुआ था। चाहे वह शेख मुजीबुर्रहमान हों या रवींद्रनाथ टैगोर का आमार सोनार बांग्ला (मेरा सोने का बंगाल) हो, इस तरह के कई प्रतीकों को उजाड़ देना चाहते हैं। ये सब चीजें कहीं न कहीं पाकिस्तान के कहने पर की जा रही हैं। ऐसा इसलिए साफ झलकता है, क्योंकि पाकिस्तान ही ऐसे प्रतीकों को नकारता है, जिनकी पहचान भारतीय धरती से जुड़ी हुई है। 


शेख हसीना के देश छोड़ने से पहले पाकिस्तान के साथ बांग्लादेश का 36 का आंकड़ा था। बांग्लादेश के तख्तापलट में अमेरिका के डीप स्टेट के साथ-साथ पाकिस्तान का भी पूरा सहयोग था। उन्होंने बांग्लादेश के चरमपंथियों को उकसाया, नैतिक, राजनीतिक और आर्थिक तौर पर मदद की और उसी का नतीजा यह हुआ कि शेख हसीना का निष्कासन हो गया।


एक तरफ तो जब से शेख हसीना की सरकार गई है, तब से बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों, मुख्यत: हिंदुओं को आए दिन हिंसा का शिकार होना पड़ रहा है और दूसरी तरफ बांग्लादेश की पाकिस्तान परस्त अंतरिम सरकार के कुछ नेता यह तक बोल रहे हैं कि भारत का बहिष्कार किया जाना चाहिए।  कुछ ने तो यह भी बोल दिया कि हम बंगाल, ओडिशा, बिहार पर भी कब्जा कर लेंगे। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी उन्होंने इस बात को दोहराया, जिसको लेकर भारत सरकार ने तीखी प्रतिक्रिया दी। वहीं, चिकन नेक के पास चीन एवं पाकिस्तान की मदद से सैनिक एयरस्ट्रिप बनाना भारत के लिए चिंता का विषय है।
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बांग्लादेश में भुखमरी फैल रही है और वह भारत से मदद मांग रहा है। लेकिन अब भारत के बांग्लादेश पर नजर रखने के दिन चले गए। भारत सरकार को बड़े भाई वाले व्यवहार में बदलाव लाकर, उस पर सख्ती से भी पेश आना होगा। कुछ राज्यों से बांग्लादेशी घुसपैठियों को निकालने की कवायद शुरू हो गई है, लेकिन  इन्हें पूरे देश से भगाना होगा। वर्तमान में बांग्लादेश के शासन, प्रशासन, जमात-ए-इस्लाम और बीएनपी जैसे संगठनों द्वारा लोगों को भड़काने की वजह से वहां अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा बढ़ी है।  शेख हसीना के कारण बांग्लादेश में स्थितियां थोड़ी ठीक रहीं, वरना वहां के हालात में अल्पसंख्यक सुरिक्षत कैसे रह पाता। दूसरी ओर, बांग्लादेश के समझदार लोग यह भली प्रकार जानते हैं कि भारत उनकी जरूरत है। पाकिस्तान आईएसआई के माध्यम से सिर्फ अस्थिरता फैला सकता है। आम बांग्लादेशी महसूस कर रहे हैं कि बांग्लादेश का भविष्य तभी है, जब वह भारत के साथ मिलकर काम करे, अन्यथा इस्लामिक ‘कट्टरपंथ’ बांग्लादेश को ले डूबेगा।  

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