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हल की जरूरत भी कहां रह जाएगी

Mon, 24 Aug 2015 07:31 PM IST
सहीराम
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वैसे तो ज्ञानीजन कहते हैं कि आदमी अपने गुस्से को, लोभ-लालच को जब्त करे, तो अच्छा है। पर बेचारे गरीब तो अपनी भूख ही जब्त नहीं कर पाते और इस चक्कर में चोर, गुंडे, उठाईगीर, बदमाश करार दिए जाते हैं। वैसे तो चुनाव में कई नेताओं की जमानतें भी जब्त हो जाती हैं। बहरहाल, जब अदालतें धोखेबाज कारोबारियों की संपत्तियां जब्त कर रही हों और बिहार में सरकार भ्रष्ट अफसरों की कोठियां जब्त कर वहां स्कूल खोल रही हो, तब दिल्ली पुलिस ने पिछले दिनों जंतर-मंतर पर आंदोलन कर रहे कुछ लोगों का एक हल ही जब्त कर लिया।
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ये वे आंदोलनकारी थे, जो वहां किसानों की लड़ाई लड़ने आए थे और उस हल को किसान स्मारक के प्रतीक के तौर पर रेसकोर्स पर स्थापित करना चाहते थे। पर रेसकोर्स आजकल रेसकोर्स के लिए उतना नहीं, जितना प्रधानमंत्री के पते के रूप में जाना जाता है। इसलिए आंदोलनकारी गिरफ्तार हुए, साथ में, बताते हैं कि उनके साथ मारपीट भी हुई।

पहले जमाने में महाजन किसानों की जमीनें ही नहीं, उनके हल-बैल भी जब्त कर लेते थे। अब चूंकि हल-बैल रहे नहीं, सो किसानों को कर्ज देनेवाले बैंक उनके ट्रैक्टर जब्त करते हैं। कोशिश उनकी जमीनें जब्त करने की भी होती है, पर इतना बूता तो किसानों में अब भी बचा है कि जमीनें जब्त न होने दें। फिर भी हल का महत्व घटा नहीं है।
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किसान रैलियों में शामिल होनेवाले नेताओं को अब भी हल का उपहार दिया जाता है। वे कंधे पर हल रखकर फोटो खिंचवाते हैं, वैसे ही जैसे तलवार-गदा लेकर खिंचवाते हैं। बल्कि एक राजनीतिक पार्टी का तो चुनाव चिह्न तक हलधर था। भले वह हल विलीन हो गया, पर उसका प्रतीकात्मक महत्व तो अभी है। इसलिए ये आंदोलनकारी भी हल लेकर आए थे। पर पुलिस ने उसे ही जब्त कर लिया। पुलिस ने अच्छा ही किया। जब भूमि अधिग्रहण आसान हो जाएगा, बेरोकटोक सेज बनने लगेंगे, इंडस्ट्रियल कॉरिडोर बनने लगेंगे, तो फिर हल की जरूरत भी क्या रह जाएगी?
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