अमेरिकी संसद के लिए न्यूयॉर्क से चुनी गई युवा सांसद एलेक्जेंड्रिया ओकासियो-कॉर्टेज सामाजिक अधिकारों की मजबूत पैरोकार हैं। वह कॉरपोरेट कर कटौती को चुनौती देने वाली प्रमुख आर्थिक नीतियों पर सवाल उठा रही हैं और स्वास्थ्य, शिक्षा और आवास के लिए अधिक बजटीय आवंटन की मांग कर रही हैं। हाल ही में एक टीवी इंटरव्यू में जब उन्होंने बताया कि लोगों के लिए अच्छे अर्थशास्त्र का क्या मतलब होना चाहिए, तब पत्रकार एंडरसन कूपर ने उनसे पूछा, इन सबके लिए आप धन कहां से लाएंगी ?
अब भारत पर नजर डालते हैं। पिछले कुछ वर्षों में कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, राजस्थान, तेलंगाना, पंजाब, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और तमिलनाडु की सरकारों द्वारा करीब 2.3 लाख करोड़ रुपये की कर्जमाफी की घोषणा की गई है। 2019 के चुनाव से पहले कई और राज्य सरकारों द्वारा ऐसी कर्जमाफी की घोषणा की संभावना है, जबकि रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने कृषि ऋण माफी पर सावधानी बरतते हुए कहा कि इससे ऋण अनुशासनहीनता को बढ़ावा मिलेगा। बैंक ऑफ अमेरिका की निवेश बैंकिंग शाखा मेरिल लिंच ने चेतावनी दी थी कि कृषि ऋण माफी जीडीपी के दो प्रतिशत के बराबर होगी।
एक सवाल बार-बार पूछा जाता है कि किसानों की कर्जमाफी के लिए पैसा कहां से आएगा। एक बार एक टीवी शो पर एंकर ने बहुत स्पष्टता से पूछा, राज्यों की तंग राजकोषीय स्थिति को देखते हुए क्या आपको यह चिंता नहीं सताती कि कृषि कर्जमाफी की होड़ सारी गणना को गड़बड़ा देगी? क्या कृषि कर्जमाफी पहले से ही एक बुरी मिसाल कायम नहीं कर रही है, जिसके परिणामस्वरूप अन्य कल्याणकारी योजनाएं पीछे रह जाएंगी?
हम जिस मुद्दे पर चर्चा कर रहे थे, वह उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा लागू की गई 36,359 करोड़ रुपये की कृषि कर्जमाफी योजना थी। अपने जवाब में मैंने कहा कि बेशक हर कर्जदार किसान तक इसका लाभ नहीं पहुंचेगा, फिर भी इस कर्जमाफी से 44 लाख किसान लाभान्वित हुए हैं। यह छोटी संख्या नहीं है और लाभान्वितों की संख्या आयरलैंड की आबादी से भी ज्यादा है। अब इसकी तुलना वर्ष 2012 से 2014 के बीच मुट्ठी भर बिजली वितरण कंपनियों को दी गई 72,000 करोड़ रुपये की कर्जमाफी से करें और आश्चर्यजनक रूप से तब कर्ज अनुशासनहीनता के बारे में कोई सवाल नहीं पूछा गया और न ही किसी ने कहा कि उत्तर प्रदेश के पास बिजली वितरण कंपनियों की कर्जमाफी की क्षमता नहीं है।
एक अन्य बिजनेस चैनल पर मुझे बताया गया कि कर्जमाफी एक घातक जहर है। यह वास्तविक मुद्दे को संबोधित करने का एक गलत तरीका है और नैतिक खतरे की ओर ले जाता है। अपने जवाब में मैंने रिजर्व बैंक के दस्तावेज का हवाला दिया, जो कहता है कि अप्रैल, 2014 से अप्रैल, 2018 की चार वर्षों की अवधि में 3.16 लाख करोड़ रुपये के कॉरपोरेट कर्ज को बट्टे खाते में डाला गया। 30 सितंबर को संसद में दिए गए एक अन्य बयान के अनुसार, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के अलावा, केवल 528 उधारकर्ता थे, जिनके पास गैर-निष्पादित संपत्ति (एनपीए) 6.28 लाख लाख करोड़ रुपये थी, जबकि उनमें से 95 फीसदी एक हजार करोड़ रुपये के डिफॉल्टर थे। 2.3 लाख करोड़ रुपये की कृषि कर्जमाफी योजना पूरी तरह से लागू होती है, तो अनुमानतः 3.4 करोड़ कृषक परिवारों को फायदा होगा। ऐसे में कॉरपोरेट कर्जमाफी का कोई तुक नहीं है, जिससे केवल कुछ ही कंपनियों को फायदा होता है। मैंने पूछा कि कैसे कोई संवेदनशील अर्थशास्त्री भारी कॉरपोरेट कर्जमाफी को सही ठहरा सकता है और गरीब किसानों पर निशाना साध सकता है। वास्तव में कॉरपोरेट कर्ज का ढेर बढ़ता जा रहा है। सकल एनपीए 11.2 फीसदी की दर से बढ़कर 2017-18 में 10.39 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया है और मात्र 40,400 करोड़ रुपये ही वसूले गए हैं।
कॉरपोरेट घरानों को भारी कर्जमाफी को लेकर आर्थिक व्यवहार्यता के बारे में कोई सवाल नहीं पूछा जाता है, जबकि कृषि ऋणों पर अनावश्यक गर्मी पैदा की जाती है, जो पूर्वाग्रहपूर्ण आर्थिक सोच को दर्शाती है। हैरानी की बात है कि जब भी मैं आर्थिक प्रोत्साहन पैकेज के रूप में पिछले 10 वर्षों में उद्योगों को दिए गए 18.60 लाख करोड़ रुपये का सवाल उठाता हूं, तो एक चुप्पी छा जाती है।
बहुत कम लोगों को पता है कि वर्ष 2008-09 में सरकार ने वैश्विक आर्थिक मंदी के समय उद्योग के लिए 1.86 लाख करोड़ रुपये का प्रोत्साहन पैकेज शुरू किया था, जो अब भी जारी है और इसके लिए लगातार दस साल भुगतान किया गया है। सरल शब्दों में कहें, तो उद्योग घरानों को हर साल प्रत्यक्ष आय सहायता मिल रही है और किसी ने कभी प्रोत्साहन पैकेज से होने वाली राजकोषीय अनुशासनहीनता पर कोई सवाल नहीं किया है। किसी ने कभी यह नहीं पूछा कि 18.60 लाख करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता के लिए पैसा कहां से आया।
अब सातवें वेतन आयोग को लें। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने संसद में कहा कि इससे सरकार पर प्रति वर्ष 1.02 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त वित्तीय बोझ बढ़ेगा। इससे केंद्र सरकार के 45 लाख कर्मचारियों और 50 लाख पेंशनरों को फायदा होगा। अगर इसे पूरे देश में राज्य सरकारों द्वारा, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, कॉलेज और विश्वविद्यालयों मे लागू किया जाएगा, तो कुल वार्षिक बोझ बढ़कर 4.5 से 4.8 लाख करोड़ रुपये हो जाएगा, यह कहना है क्रेडिट सुइस बैंक के अध्ययन का। इस पर किसी ने कभी कोई सवाल नहीं किया कि इसके लिए पैसा कहां से आएगा और न ही किसी ने कहा कि इससे राजकोषीय घाटा बढ़ेगा। लेकिन किसानों की कर्जमाफी या अन्य प्रत्यक्ष सहायता पहल की बातें करें, तो राजकोषीय घाटे पर बात करने में मीडिया अति सक्रियता दिखाता है।
अमेरिका में जैसा कि एलेक्जेंड्रिया ने बताया, पैसा वहीं से आएगा, जहां से भारी कॉरपोरेट छूट के लिए पैसा आता है, जहां से रक्षा बजट के लिए आता है, जहां से अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए आता है। भारत में भी किसानों से लिए पैसा उसी स्रोत से आएगा, जहां से सातवें वेतन आयोग के बजटीय आवंटन के लिए आता है, जहां से कॉरपोरेट छूट के लिए आता है और जहां से बड़े पैमाने पर बैंक एनपीए को बट्टे खाते में डालने के लिए आता है।