नया वर्ष शुरू होने वाला है। परिवर्तन के इस मौसम में उम्मीद है कि नरेंद्र मोदी परिवर्तन और विकास के उस रास्ते पर लौट आएंगे, जो उन्होंने हमें दिखाया था 2014 में। आज भी परिवर्तन की आवश्यकता है हर क्षेत्र में। रही विकास की बात, तो भारत आज भी पीछे है, उन देशों से भी जो कभी हमसे पीछे थे।
कुछ राजनीतिक पंडित हैं- जिनमें मेरे दोस्त भी हैं- जो मानते हैं कि मोदी को दूसरी बार इस देश की जनता ने प्रधानमंत्री बनाया है सिर्फ इसलिए कि वह हिंदुओं के राजा बन कर हिंदुत्ववादियों का एजेंडा पूरा कर सकें। मेरी राय में ये लोग गलत हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान मैं बहुत घूमी थी। जहां भी गई, लोगों ने विकास की आशा जताई। न हिंदुत्व की बातें कीं, न राम मंदिर की। बातें हुईं सिर्फ रोजगार और आम सुविधाओं में सुधार की।
कई बार मुझे अपने घरों के अंदर ले जाकर दिखाया कि ‘मोदी’ ने उनके लिए क्या कुछ किया है। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के भूले हुए गांवों में मैं गई और प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बने घरों में मैंने गैस सिलेंडर, बिजली, पानी की सुविधाएं देखी, जो संभव हो सकी केंद्र सरकार की योजनाओं द्वारा। मैंने शौचालय देखे जो स्वच्छ भारत अभियान के शुरू होने के बाद बने हैं। लोगों ने स्वीकार किया कि इनमें से कई योजनाएं पहले से थीं, लेकिन साथ में यह भी कहा कि पहले की योजनाएं नाकाम रही थीं भ्रष्टाचार के कारण।
सो, मेरी राय में मोदी को दोबारा प्रधानमंत्री बनाया गया उनके विकास कार्यों के कारण। लेकिन न जाने क्यों अपने दूसरे दौर में उन्होंने अपना ध्यान उस एजेंडे पर केंद्रित कर लिया, जिसे देखकर मुसलमानों और कई समझदार हिंदुओं को लगने लगा है कि उनके कदम भारत को एक हिंदू राष्ट्र बनाने की तरफ बढ़ रहे हैं। इस वर्ष के अंतिम दिनों में जो देश भर में हमने अराजकता, हिंसा और अशांति देखी है, वह इस एजेंडे का परिणाम है। मोदी लाख कहें कि लोगों को विपक्षी दल और कुछ राष्ट्र विरोधी ताकतें गुमराह कर रही हैं, लेकिन सच तो यह है कि उनके गृह मंत्री के भाषण सुनकर ही लोग घबरा कर शहरों और महानगरों की सड़कों पर उतरे हैं।
जब भारत केकक गृह मंत्री बार-बार भाषण में एक मजहब से जुड़े हुए गरीब लोगों को 'दीमक' कहे, तो उस मजहब से जुड़े हमारे अपने नागरिकों को क्यों नहीं लगेगा कि उनकी नागरिकता खतरे में है? क्यों न उन्हें लगने लगेगा कि उन्हें दूसरे दर्जा का नागरिक बनाने के प्रयास हो रहे हैं? पिछले सप्ताह प्रधानमंत्री ने रामलीला मैदान में दिए अपने भाषण को शुरू किया इन शब्दों से ‘विविधता में एकता’। लंबा भाषण देकर उन्होंने भारत के मुस्लिम नागरिकों को आश्वासन देने की कोशिश की कि वह अब भी चाहते हैं ‘सब का साथ, सब का विकास, सब का विश्वास’।
समस्या यह है प्रधानमंत्री जी कि आपके दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद से आपके अपने कई वरिष्ठ मंत्री और सोशल मीडिया पर आपके समर्थक कुछ और कहते आए हैं। समस्या यह भी है कि जिस विकास और परिवर्तन की देश को आशा थी, उसकी न राजनीतिक तौर पर और न ही आर्थिक तौर पर झलक दिखी है। सो, आपको आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि मायूसी और अराजकता फैल गई है देशभर में। जिस सपने को देख कर लोगों ने आपको दूसरी बार प्रधानमंत्री बनाया था, वह सपना टूटने लगा है। एक बार फिर दिखने लगा है कि भारत 21वीं सदी में अपनी सही जगह तक नहीं पहुंच पाएगा।