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न्याय प्रक्रिया: आखिर कमी कहां रह जाती है? मालेगांव बम धमाका मामले के बाद शुरू हुआ नया विमर्श

शेखर अय्यर Published by: शिव शुक्ला Updated Wed, 06 Aug 2025 07:37 AM IST

सार

मुंबई की लोकल ट्रेनों व मालेगांव बम धमाकों में अभियोजन पक्ष अंततः अभियुक्तों के अपराध को ‘उचित संदेह से परे’ साबित करने में विफल रहा। कहा जा सकता है कि न्यायपालिका उच्च कानूनी मानकों को बनाए रखना चाहती थी। उसने संदेह या त्रुटिपूर्ण जांच के आधार पर आरोपियों को दोषी ठहराने से इन्कार कर दिया।
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मालेगांव विस्फोट मामला और साध्वी प्रज्ञा सिंह। - फोटो : ANI/PTI


वर्ष 2006 में मुंबई में पश्चिमी लाइन पर लोकल ट्रेनों में सिलसिलेवार सात बम विस्फोट हुए थे, जिनमें 187 लोग मारे गए और 800 से अधिक घायल हुए थे। बीती 22 जुलाई को, बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस मामले में सभी 12 आरोपियों को बरी कर दिया। इसने विशेष मकोका अदालत के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें उन्हें पहले दोषी ठहराया गया था। हाईकोर्ट ने मुंबई पुलिस के आतंकवाद निरोधी दस्ते (एटीएस) द्वारा की गई जांच की भी कड़ी आलोचना की तथा गंभीर प्रक्रियागत अनियमितताओं और विश्वसनीय साक्ष्यों के अभाव की ओर इशारा किया। अदालत ने टिप्पणी की कि एटीएस ने ‘मामले को सुलझाने का झूठा दिखावा’ किया था। बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाई-प्रोफाइल आतंकी मामलों में जांच-प्रक्रिया की निष्पक्षता और पुलिस की जवाबदेही के प्रति चिंता जताई। अदालत की टिप्पणियों ने उचित प्रक्रिया को बनाए रखने और निष्पक्ष सुनवाई के मानकों को सुनिश्चित करने में व्यवस्थागत विफलता की ओर इशारा किया।


बम बनाने में प्रयुक्त सामग्री, जिहादी साहित्य आदि सहित साक्ष्यों की मौजूदगी के बावजूद, जांच एजेंसी ने मकोका के तहत दर्ज इकबालिया बयानों पर ही काफी हद तक भरोसा किया, जिन्हें उच्च न्यायालय ने अपर्याप्त पाया, क्योंकि उनके समर्थन में कोई साक्ष्य नहीं था। इसके अलावा, प्रक्रियागत त्रुटि का हवाला देते हुए जांच एजेंसी ने कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर) जैसे महत्वपूर्ण साक्ष्य नष्ट कर दिए।


देवेंद्र फडणवीस सरकार ने मुंबई ट्रेन विस्फोट मामले में दोषियों को बरी किए जाने के फैसले के खिलाफ तुरंत सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। नतीजतन, सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक मिसाल के तौर पर हाईकोर्ट के फैसले के अमल पर रोक लगा दी। हालांकि, उसने कहा कि रिहा किए गए दोषियों को आत्मसमर्पण करने की जरूरत नहीं है।


महाराष्ट्र के मालेगांव में एक मस्जिद के पास 29 सितंबर, 2008 को विस्फोट हुआ था, जिसमें छह लोगों की मौत हो गई और सौ से ज्यादा लोग घायल हो गए थे। 31 जुलाई को मुंबई की एक विशेष राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) अदालत ने घटना के लगभग 17 साल बाद, पूर्व भाजपा सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर और लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित सहित सभी सात आरोपियों को बरी कर दिया। एनआईए कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष ‘विश्वसनीय और ठोस’ सुबूत पेश करने में विफल रहा।


रमजान के आखिरी दिन और नवरात्र शुरू होने से पहले हुए हमले के इरादे पर अदालत ने साफ कहा कि ‘यह स्पष्ट था कि षड्यंत्रकारियों ने लोगों को आतंकित करने, जान-माल की हानि पहुंचाने, समुदाय के लिए आवश्यक आपूर्ति और सेवाओं को बाधित करने, सांप्रदायिक दरार पैदा करने और राज्य की आंतरिक सुरक्षा को खतरे में डालने के इरादे से बम विस्फोट किया।’ हालांकि, विशेष न्यायाधीश एके लाहोटी की अध्यक्षता वाली एनआईए अदालत ने अभियोजन पक्ष के मामले में कई गंभीर कमियों को उजागर किया। अदालत ने जोर देकर कहा कि ‘मात्र संदेह वास्तविक सुबूत की जगह नहीं ले सकता। आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, लेकिन अदालत केवल धारणा के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहरा सकती।’ अदालत ने स्पष्ट किया कि दोषसिद्धि के लिए काल्पनिक आरोपों के बजाय ठोस सुबूतों की आवश्यकता होती है।


मालेगांव मामले की जांच महाराष्ट्र आतंकवाद निरोधक दस्ते (एटीएस) द्वारा शुरू की गई थी। उस समय एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे, जो जांच का नेतृत्व कर रहे थे, इस मामले में पहली गिरफ्तारी के कुछ ही दिनों बाद 26 नवंबर, 2008 को मुंबई आतंकवादी हमले में शहीद हो गए थे।
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साध्वी प्रज्ञा ठाकुर, कर्नल प्रसाद श्रीकांत पुरोहित और अन्य की गिरफ्तारी के बाद कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने ‘हिंदू आतंकवाद’ का ढिंढोरा पीटा था। साध्वी प्रज्ञा ने अदालत में शिकायत की थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत व अन्य का नाम लेने के लिए उन्हें बुरी तरह प्रताड़ित किया गया था। इसी प्रकार, सैन्य खुफिया विभाग में कार्यरत कर्नल पुरोहित को भी अपराध स्वीकार करने के लिए मानसिक यातना दी गई। वर्ष 2011 में, एनआईए ने इस मामले को अपने हाथ में ले लिया और एटीएस की जांच की आलोचना की, जबकि वह उसी दिशा में आगे बढ़ रही थी। वर्ष 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद हालात बदलने लगे। वर्ष 2016 में, उसने यह तर्क देते हुए कि एटीएस ने कड़े आतंकवाद-रोधी कानून को लागू करने में उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया, मकोका के आरोप हटा दिए।


इसके अलावा भी कई खामियां और चूकें थीं, जैसे अदालती रिकॉर्ड से 13 गवाहों के बयान गायब हो गए। तत्कालीन विशेष लोक अभियोजक, रोहिणी सालियान ने सार्वजनिक रूप से आरोप लगाया कि एनआईए ने उन्हें आरोपियों के प्रति ‘नरम रुख अपनाने’ के लिए कहा था। उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। लगभग दो दशकों की कानूनी लड़ाई नाकाम हो गई है। पीड़ितों के परिवार अब भी न्याय की तलाश में हैं। दोनों ही मामलों में अभियोजन पक्ष अंततः अभियुक्तों के अपराध को ‘उचित संदेह से परे’ साबित करने में विफल रहा। फैसलों ने जांच प्रक्रियाओं में गंभीर खामियों की ओर इशारा किया। इसके अलावा, दोनों ही मामलों में अभियुक्तों को बरी होने से पहले वर्षों जेल में बिताने पड़े।


कहा जा सकता है कि न्यायपालिका उच्च कानूनी मानकों को बनाए रखना चाहती थी। उसने संदेह या त्रुटिपूर्ण जांच के आधार पर दोषी ठहराने से इन्कार कर दिया। इन मामलों ने दिखाया कि न्याय के लिए मजबूत जांच पद्धतियों और उच्च-गुणवत्ता वाले साक्ष्यों की जरूरत क्यों है।


चूंकि, एनआईए ने यह नहीं कहा है कि वह बरी किए गए लोगों के खिलाफ अपील करेगी, इसलिए 2006 के मालेगांव विस्फोट से संबंधित मामलों का अभी तक कोई समापन नहीं हुआ है। इसी प्रकार, 2007 के समझौता एक्सप्रेस विस्फोटों, जिनमें 68 लोग मारे गए थे, 2007 के हैदराबाद मक्का मस्जिद विस्फोटों, जिनमें नौ लोग मारे गए थे, तथा 2007 के अजमेर दरगाह शरीफ विस्फोटों, जिनमें तीन लोगों की जान गई थी, के बारे में भी कोई अंतिम न्यायिक निर्णय नहीं हुआ है।

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