एक ओर तो जीडीपी तेजी से बढ़ती जा रही है, दूसरी ओर शेयर बाजार ऊपर छलांग लगाते जा रहा है। पिछले दिनों सेंसेक्स ने 38,000 की ऊंचाई छू ली। यानी देश में समृद्धि के तमाम लक्षण दिख रहे हैं। इसके बावजूद छोटे निवेशकों के लिए कमाई के रास्ते सीमित हैं। रियल एस्टेट मंदी के दौर से गुजर रहा है, तो बैंकों में सावधि जमा से पर्याप्त ब्याज नहीं मिल पा रहा है। सोने की कीमतें आसमान छू रही हैं और उनके नीचे जाने की पूरी संभावना है।
पूंजी बाजार में नए शेयर धड़ाम होते जा रहे हैं, तो बड़ी तादाद में म्युचुअल फंड नीचे जा रहे हैं। डाक घर की बचत योजनाओं और लोकप्रिय पीपीएफ की भी ब्याज दरें घटा दी गईं हैं। इसके अलावा उनमें निवेश की सीमा भी है। कुल मिलाकर छोटे और मंझोले निवेशकों के लिए ऐसा कुछ नहीं दिख रहा है, जिसमें वे अपनी गाढ़ी कमाई को लगा सकें।
भारत में पिछले दो दशकों में निवेश के पैटर्न में बदलाव आया है और निवेशक अब अपने धन को बढ़ाने के रास्ते ढूंढ़ते रहते हैं। तकरीबन एक दशक पहले तक रियल एस्टेट निवेश का जोरदार माध्यम माना जा रहा था और लोगों ने उसमें काफी पैसा लगाया। तेजी का लाभ उठाकर निवेशक और रियल एस्टेट प्रमोटर भी मालामाल हुए, लेकिन बिल्डरों के लालच और बुरी नीयत के कारण यह सेक्टर बुरी तरह मार खा बैठा। कमाई तो दूर लाखों लोग अपनी गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा फंसा बैठे हैं।
उधर ब्याज दरें घटने से बचत योजनाएं अब पहले जैसी आकर्षक नहीं रहीं। पीपीएफ को छोड़कर बाकी योजनाओं में पहले जैसा दम नहीं रहा है और इनमें निवेश सोच-समझकर करना ही उचित होगा। फिक्स्ड डिपॉजिट में ब्याज की दरें कम हो चुकी हैं और उनमें पहले जैसी बात नहीं रही। अगर इन्हें मुद्रास्फीति से जोड़ें, तो ये भी फायदे का सौदा नहीं रहीं। इनके ब्याज पर भी टैक्स कटता है, हालांकि पिछले बजट में वित्त मंत्री ने उसके अपवाद की सीमा बढ़ा दी है। फिर भी इस पर पूरी तरह से निर्भर रहना उचित नहीं होगा।
सोना, जो सदियों से निवेश और आर्थिक सुरक्षा का बहुत बड़ा माध्यम रहा है, इस समय अपनी चमक खोता जा रहा है। इसकी कीमतें आसमान छू रही हैं और यह निवेश का माध्यम नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस समय सोने की कीमतें ऊंचे स्तर पर चली गई हैं और इनका गिरना संभव है। सच तो यह है कि सोने की कीमत 30 हजार रुपये प्रति दस ग्राम से नीचे ही रहनी चाहिए थी, लेकिन अमेरिकी अर्थव्यवस्था के उतार-चढ़ाव और भारत में टैक्स के कारण ये ऊपर है। अगर किसी को सोने में निवेश करना ही है, तो रिजर्व बैंक के सॉवरेन गोल्ड बांड में किया जाए। इसके अलावा कई और सरकारी योजनाएं हैं, जिनमें सोना अपने पास रखे बगैर उसकी खरीद-बिक्री की जा सकती है। यह एक अच्छा तरीका है और सोना इसमें पूरी तरह सुरक्षित भी रहता है।
शेयर बाजार की चाल अभी हैरान कर रही है। सूचकांक नित नए रिकॉर्ड बना रहा है, लेकिन छोटे और मंझोले शेयर हैं कि इस दौर में ऊपर ही नहीं जा रहे हैं। ज्यादातर निवेशक इनमें ही पैसे लगाते हैं। 2014 से 2017 तक बढ़िया रिटर्न देने के बाद अब स्मॉल और मिड शेयर निवेशकों को बुरी तरह निराश कर रहे हैं। इस साल के पूर्वार्ध में शेयर सूचकांक के बढ़ने के बावजूद इनमें निवेशकों को 12 से 15 प्रतिशत का घाटा हुआ है। खुदरा निवेशकों ने इनमें काफी घाटा उठाया। इसका कारण यह रहा कि इनकी कीमतें इनके वास्तविक मूल्य से ज्यादा हो गई थीं।
दूसरी ओर प्राइमरी बाजार में जहां बड़े पैमाने पर आईपीओ जारी हो रहे हैं, वहां निवेशकों के हाथ जल रहे हैं, क्योंकि ज्यादातर शेयर थोड़े ही समय में अपने वास्तविक मूल्य से भी कम पर चले गए हैं। इसका भी वही कारण है। प्रमोटरों ने अपने शेयरों की कीमत कहीं ज्यादा रखी और किसी तरह से आईपीओ का प्रबंधन किया। लेकिन बाजार में आते ही कइयों की कलई खुल गई। नतीजतन यह सेक्टर अब निवेशकों के लिए अनाकर्षक हो गया है।
पिछले दिनों बाजार नियामक सेबी ने एचडीएफसी एएमसी को अपने खास वितरकों को आईपीओ के पहले काफी कम दाम में प्राइवेट प्लेसमेंट करने से रोका। इसके पहले उसने आईसीआईसीआई प्रु एएमसी को उसके पांच म्युचुअल फंड योजनाओं के 240 करोड़ रुपए लौटाने को कहा, जो उन्होंने आईपीओ में लगाए थे। इस आईपीओ को डूबने से बचाने के लिए फंडों से पैसे लगवाए गए थे। यह शेयर बाद में 41 प्रतिशत तक जा गिरा था और निवेशकों को खासा घाटा हुआ।
इस मामले से साफ है कि म्युचुअल फंड मैनेजर अपनी सुविधा और दूसरों के हितों के लिए निवेशकों के हितों से समझौता कर सकते हैं। ध्यान रहे कि आईसीआईसीआई प्रु एएमसी देश का सबसे बड़ा म्युचुअल फंड हाउस है और उसके इस कृत्य से म्युचुअल फंडों के बारे में विश्वास से कुछ कहा नहीं जा सकता है। सच तो यह है कि म्युचुअल फंडों में निवेश जोखिम भरा है। फंड मैनेजर आकर्षक विज्ञापनों के जरिये वे ग्राहकों को रिझा तो लेते हैं, लेकिन जोखिम वाली बात छुपा लेते हैं, जिसका नतीजा है कि कई म्युचुअल फंड अभी घाटे में चल रहे हैं। इस बात में भी कोई दम नहीं है कि लंबे समय तक म्युचुअल फंड में निवेश से ज्यादा फायदा होगा। अगर घाटे वाले फंड में आपका पैसा फंसा तो वह आपको बहुत ज्यादा घाटा दे जाएगा। यह तो फंड मैनेजर की बुद्धिमानी और उसकी मंशा पर निर्भर करता है कि वह किस तरह आपके पैसे का कहां निवेश करे। दरअसल लगातार मुनाफा कमाने का कोई फॉर्मूला भी नहीं है।
जब बाजारों में तेजी आती है, तो निवेश के कई रास्ते खुलते हैं, लेकिन भारत में ऐसा नहीं हो पा रहा है और छोटे निवेशकों के सामने समस्या है कि वे कौन-सा रास्ता चुनें कि उन्हें लाभ हो। मुनाफा आपके विवेक, संयम और समझ पर ही निर्भर करता है, क्योंकि इन्हीं परिस्थितियों में लोग पैसा भी कमा रहे हैं।