भारत ने विश्व के लोकतांत्रिक इतिहास में एक ऐसा अभूतपूर्व कीर्तिमान स्थापित किया है, जिसकी अन्य कोई मिसाल मिलना कठिन है। भारतीय जनता पार्टी ने निर्णायक बहुमत के साथ सत्तारूढ़ होने के बाद अब दस करोड़ की सदस्य संख्या का ऐसा मील का पत्थर स्थापित किया है, जो किसी भी अन्य दल के लिए हासिल कर पाना असंभव नहीं, तो कठिन जरूर होगा।
गणतंत्र में संख्या का अंकगणित सत्ता और विपक्ष तय करता है। संविधान संशोधन, विधेयक का कानून में बदलना, संसद में प्रस्ताव पारित होना या न होना, सत्ता पक्ष को झुकाने की क्षमता अथवा स्वयं झुकने की स्थिति, नए सांसदों का निर्वाचन, संसदीय दायित्वों का आवंटन एवं विदेशों से होने वाले करारों का अनुमोदन अथवा अस्वीकार, सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है, कि आपेक पास कितना संख्या बल है। इस समय निर्वाचन आयोग द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर छह राजनीतिक दल मान्यता प्राप्त हैं और 25 दलों को प्रांतीय दलों की मान्यता है। इसके अलावा 1,737 ऐसे दल पंजीकृत हैं, अमान्यता प्राप्त दलों की श्रेणी में हैं। आज तक शायद ही किसी दल ने कभी अपनी सदस्य संख्या बताई हो या संगठनात्मक चुनाव की परिपाटी एक निश्चित पारदर्शी तरीके से निभाई है। कम्युनिस्ट दलों में ऐसा होता होगा, लेकिन वे शनैः शनैः भारतीय राजनीति में सिकुड़ते गए हैं।
जनसंघ से लेकर भारतीय जनता पार्टी के उदय और 2014 के चुनाव तक की यह यात्रा हिंदू सभ्यता और संस्कृति के प्रति आग्रह और अभिमान रखने वाले कार्यकर्ताओं की ऐसी यात्रा रही है, जो हाशिये पर छिटके हुए और सब तरफ से आघात सहने वाले कार्यकर्ताओं द्वारा सत्ता में आने तथा देश का राजनीतिक एजेंडा तय करने की तक की अद्भुत गाथा है। 2014 का चुनाव भारतीय स्वातंत्र्योत्तर इतिहास का सबसे बड़ा और सबसे लंबी अवधि तक चलने वाला चुनाव था, जिसमें 83 करोड़ 41 लाख वैध मतदाता पंजीकृत थे। पूरे विश्व में इतना बड़ा चुनाव कभी इतिहास में नहीं हुआ। इनमें भाजपा को 31 फीसदी मत के साथ 282 सीटों पर विजय मिली। अर्थात लोकसभा की कुल सीटों का 51.9 प्रतिशत हिस्सा भाजपा को मिला। उसकी निकटतम प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस को केवल 19.3 प्रतिशत मत और 44 सीटें मिलीं। क्या इस ऐतिहासिक जनोत्सव को केवल एक पार्टी की जय पराजय के रूप में देखा जाए?
भारत में 1952 से अब तक कांग्रेस और जनसंघ के अलावा अनेक दल और गठबंधन जन्मे तथा इनमें से अनेक कुछ समय के लिए प्रभावी होकर अस्ताचलगामी हो गए। इस परिदृश्य में कोई दल अपने नए रूप में 1980 में जन्म लेता है और महज 24 वर्ष के बाद निर्णायक बहुमत के साथ सत्ता में आता है, और दुनिया के सबसे अधिक सदस्यों वाले दल का भी रूप लेता है, तो यह उस दल की विचारधारा और कार्यकर्ताओं की निष्ठा का एक शानदार उदाहरण माना जाना चाहिए। महत्वपूर्ण बात यह है कि जिस एक व्यक्ति ने इस विचारधारा की गंगोत्री के भगीरथ का दायित्व निभाया, उन डॉ केशवराव बलीराम हेडगेवार को तुलना में बहुत कम लोग जानते हैं। 1925 में नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना कर डॉ हेडगेवार ने भारत के इतिहास में एक नया अध्याय रचा। इसी संघ में तपे और बढ़े दो स्वयंसेवक अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने। इसी विचारधारा से रचे-पगे संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता अमित शाह को दुनिया की इस सबसे बड़ी पार्टी का अध्यक्ष बनने का दुर्लभ सौभाग्य मिला। यह वह विचारधारा है जिसने प्रारंभ से ही कांग्रेस और कम्युनिस्टों के सामने कठोर चुनौती खड़ी की है।