अकादमिक (ऑस्कर) पुरस्कारों की घोषणा हो चुकी है। भारतीय कलाकारों से सजी लाइफ ऑफ पाई को चार ऑस्कर मिले। निश्चय ही हॉलीवुड में बनने वाली फिल्मों में भारत की पैठ बढ़ रही है और उसी अनुपात में ऑस्कर पुरस्कारों से भारतीय संबंध भी, लेकिन किसी भारतीय फिल्म के लिए ऑस्कर के मिलने का इंतजार इस बार भी खत्म नहीं हुआ। निर्विवाद रूप से बदलती जिंदगियों के साथ हमारी फिल्में भी बदल रही हैं, पर सवाल यह है कि उनमें बदलाव कितना आ रहा है।
ऑस्कर पुरस्कार इसका एक पैमाना हो सकता है। बर्फी को इस वर्ष भारत की ओर से बेहतरीन विदेशी फिल्म वर्ग के अंतर्गत ऑस्कर के लिए भेजा गया, पर यह पहले ही दौड़ से बाहर हो गई। बर्फी के चुनाव के समय समीक्षकों ने इस बात पर सवाल खड़े किए कि इसके कुछ दृश्य बैनी ऐंड जून और कोरियाई फिल्म ओएसिस से मिलते-जुलते हैं।
प्रियंका की जरा-सी हंसी के लिए रणबीर का नाक का घुमाना सिंगिंग इन द रेन से लिया गया। वहीं चार्ली चैप्लिन की सिटी लाइट्स (1931) के कुछ सीन भी फिल्म में दिखाई दिए। लिहाजा सवाल वही है कि इतने व्यापक सांस्कृतिक उत्पादन के बावजूद हमारे सपनों और चिंताओं को बॉलीवुड सिनेमा के रूपहले परदे पर उतनी विश्वसनीयता से उतार पाने में नाकाम क्यों रहा है कि उसे ऑस्कर के लायक न समझा जाए।
दुनिया में सबसे ज्यादा फिल्मों का निर्माण करने वाले देशों में भारत भी एक है और यहां से अब तक चालीस से ज्यादा फिल्में ऑस्कर के लिए भेजी गई हैं, जिसमें अधिकतर हिंदी फिल्में रहीं। क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मों को उतने ज्यादा मौके नहीं मिले। आठ बार तमिल और दो बार बांग्ला भाषा को यह सम्मान मिला, पर मराठी, मलयालम और तेलुगु जैसी भाषओं में बनी फिल्में सिर्फ एक बार ही विदेशी भाषा वर्ग के लिए नामांकित हो पाईं।
भारत को ऑस्कर न मिल पाने की वजह फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया की ज्यूरी को भी ठहराया जाता है। फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया ही वह संस्था है, जो भारत की तरफ से ऑस्कर के लिए फिल्मों के चयन का काम करती है। लेकिन सच यह भी है कि कई अच्छी फिल्मों को इस संस्था ने ऑस्कर के लायक नहीं समझा।
ऑस्कर में बॉलीवुड की बढ़ती दिलचस्पी के लिए भारतीय मध्यवर्ग को श्रेय दिया जा सकता है। इस वर्ग में फिल्मों के प्रति समझ बढ़ने का ही नतीजा है कि आज अंग्रेजी फिल्मों को हिंदी में डब करने की परंपरा बढ़ी है। ऐसे में किसी भी विदेशी फिल्म में भारतीय किरदार या भारतीय परिवेश फिल्म को व्यावसायिक रूप से सफल बनाने का एक कारक हो सकता है।
हमारे यहां उदारीकरण के पश्चात मनोरंजन एक बड़े उद्योग के रूप में उभरा जरूर, पर तकनीक के लिए हॉलीवुड पर हमारी निर्भरता नई नहीं है। भारतीय फिल्म बाजार में डब फिल्में औसतन पचास करोड़ रुपये का वार्षिक कारोबार करती हैं। ऐसी फिल्में बॉक्स ऑफिस की कुल फिल्मों की संख्या का दो से तीन प्रतिशत ही होती हैं, पर इनका असर मारक हो रहा है।
भारतीय सिनेमा में मौलिकता के नाम पर सिर्फ गाने हैं, जिससे हमारी पहचान है। कंटेंट के लिहाज से दुनिया की अन्य भाषाओं की तुलना में भारतीय सिनेमा कहीं नहीं ठहरता, पर व्यावसायिक लाभ की वजह से बॉलीवुड को नजरंदाज करना आसान नहीं। ईरानी भाषा में फिल्में कम बनती हैं, पर उन्होंने विश्व सिनेमा में अपनी जोरदार उपस्थिति दर्ज कराई है, जिसमें मौलिकता और संप्रेषणीयता भी है।
भारतीय फिल्मों में बढ़ते कॉर्पोरेटीकरण से छोटे फिल्म निर्माताओं के लिए फिल्म बनाना मुश्किल है। उनकी फिल्मों में तभी निर्माता पैसा लगाएंगे, जब पटकथा में पैसा वापस पाने की गारंटी हो। भारतीय दर्शक एक विचित्र स्थिति का शिकार है। कल्टीवेशन थ्योरी के अनुसार, जो उसे दिखाया जा रहा है, वह वैसी फिल्में देखने का आदी हो चुका है।
वह ज्यादा की उम्मीद नहीं करता। तभी तो तकनीक और प्रस्तुति में भले ही हम हॉलीवुड से पीछे हों, पर अपने दर्शकों का मनोरंजन करने में बहुत आगे हैं। वक्त है बदलाव का, पर बड़े पैमाने पर हमारा सिनेमा कब व्यवसाय के अलावा कंटेंट के हिसाब से विश्वस्तरीय हो पाएगा, इसका हम सबको इंतजार है।